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गांधी और विश्व सिनेमा (भाग- 5): गांधी जी पर कुछ और फिल्में

Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 04 Oct 2022 05:59 PM IST
सार

रजित कपूर युवा गाधी के लिए पुरस्कृत हुए। गांधी न तो बौद्धिक थे, न राजनेता और न ही समाज सुधारक या धार्मिक लेकिन करोड़ों लोगों के पूज्य बने, उद्धारक बने, फ़िल्म यह सब पुरजोर ढ़ंग से प्रदर्शित करती है।

महात्मा गांधी पर बनी फिल्में
महात्मा गांधी पर बनी फिल्में - फोटो : Amarujala Creatives
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विस्तार

फ़िल्म की शुरुआत में कम्प्यूटर में जिन्ना से संबंधित सारा डाटा उड़ जाने पर जमील देहलवी और अकबर अहमद ने इतिहास फ़िर से अपने ढ़ंग से लिखने का प्रयास कर, फ़िल्म ‘जिन्ना’ बनाई। 1998 की इस फ़िल्म में गांधी जी (सैम दस्तूर) हैं, पर फ़िल्म गांधी, नेहरू को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत नहीं करती है। यहाँ हीरो हैं कायद-ए-आज़म जिन्ना (सर क्रिस्टोफ़र ली)।



नाटकीय फ़िल्म के कथावाचक शशि कपूर हैं। जिन्ना स्वयं गैर धर्म की लड़की से शादी करते हैं, पर बेटी का गैर मुस्लिम लड़के से विवाह पसंद नहीं करते हैं, अत: बेटी बंबई में ही रह जाती है। जिन्ना पाकिस्तान रचने में व्यस्त हैं।

फिल्म ‘हे राम’ में गांधी 

निर्देशक जब्बर पटेल ने 2000 में ‘डॉ. बाबा साहब आंबेडकर’ फिल्म बनाई। आंबेडकर (मोहन गोखले) को केंद्र में रखती फ़िल्म में गांधी जी प्रमुखता से नहीं आते हैं। 2000 में ही कमल हासन ने ‘हे राम’ काल्पनिक राजनैतिक फ़िल्म तमिल-हिन्दी में बनाई। कई पुरस्कार प्राप्त, इलईराजा के संगीत की फ़िल्म ‘हे राम’ में गांधी (नसीरुद्दीन शाह) तथा उनकी हत्या नए अंदाज में पेश हैं।

विवादाग्रस्त फ़िल्म में शाहरुख खान, अतुल कुलकर्णी, ओम पुरी, सौरभ शुक्ला, विक्रम गोखले, रानी मुखर्जी, हेमा मालिनी, गिरीश कर्नाड, श्रुति हासन, फ़रीदा जलाल, मनोज पहवा, अरुण बाली, तुषार गांधी (गांधी के परपोते) ने भी अभिनय किया है। शाहरुख खान तथा कमल हासन के अभिनय को सराहा गया।


2010 में अमित राय ने 'रोड टू संगम' फिल्म एक मुस्लिम मैकेनिक की जिंदगी पर बनाई, मैकेनिक को एक पुरानी कार मरम्मत के लिए दी गई, उसे ये नहीं पता था कि इसी गाड़ी में महात्मा गांधी की अस्थियों को त्रिवेणी संगम ले जाकर प्रवाह किया गया था। इसी समय एक संगठन के लोग आकर उत्पात करते है। 

श्याम बेनेगल ने जवाहरलाल नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ पर ‘भारत एक खोज’ दूरदर्शन के लिए सीरियल बनाया। ओम पुरी की दमदार आवाज वाले इस विशिष्ट सीरियल को देखने लोग सब काम-धाम छोड़ कर टीवी के सामने बैठ जाते थे।

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सीरियल के 49 पार्ट 1-2 एपीसोड (और आगे के दो-तीन एपीसोड में भी) में गांधी और उनके जीवन दर्शन को प्रदर्शित किया गया है। उनका प्रिय भजन ‘रघुपति राघव...’, ‘वैष्णव जन तो...’, उनकी जयजयकार, अछूतोद्धार, चरखा, अहिंसा, सत्य, उपवास, असहयोग आंदोलन, नमक आंदोलन, स्त्री सशक्तिकरण, ‘करो या मरो’ भी यहाँ स्थान पाते हैं।

 


‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने छोड़ी छाप

2006 की राजकुमार हिरानी की ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ फ़िल्म ने दर्शकों के हृदय को छुआ। एक गुंडा-मवाली प्यार में पड़ नायिका (विद्या बालन) को रिझाने के लिए इतिहास का प्रोफ़ेसर बनने का नाटक करता है, धीरे-धीरे गांधी को पढ़ते हुए खुद परिवर्तित हो जाता है। फ़िल्म में बापू (दिलीप प्रभावालेकर) स्वयं नायक (संजय दत्त) से बात करने बार-बार उपस्थित होते हैं।

फ़िल्म के कारण ‘गांधी-गीरी’ एक नया शब्द चल पड़ा। फ़िल्म का संवाद 'सर्किट (अरसद वारसी) मुझे गांधी जी दिखाई दे रहे हैं'  खूब प्रचलित हुआ था। फ़िल्म कॉमेडी जॉनर की होती हुई भी बड़ा संदेश देती है।
 
दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ती फ़ातिमा मीर ने ‘अप्रेंटिसशिप ऑफ़ ए महात्मा’ लिखी। किताब को आधार रख श्याम बेनेगल ने स्क्रीनप्ले लिख ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा’ (1996) बनाई। गांधी जी में जीवन में दक्षिण प्रवास की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे दो मुस्लिम भाइयों के मुकदमे के सिलसिले में वहाँ गए थे। वहाँ दो दशक रहने के दौरान न केवल उनका जीवन परिवर्तित हुआ बल्कि देशों के भाग्य भी पलट गए।

उन्होंने रंगभेद भोगने तथा अपनी अस्मिता कायम रखने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन चलाया था। बंधुआ मजदूरों और उनके मालिकों का जीवन पूरी तरह बदल गया। हिन्दी में यह फ़िल्म ‘गांधी से महात्मा तक’ नाम से है। पल्लवी जोशी (बा) एवं रजित कपूर (गांधी) का बेहतरीन अभिनय इस फ़िल्म का मजबूत पक्ष है। 

बापू से प्रेरित फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई
बापू से प्रेरित फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई - फोटो : Twitter

दक्षिण अफ़्रीका में गांधी के संघर्ष की कहानी

फ़िल्म ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा’ दक्षिण अफ़्रीका में गांधी के संघर्ष और सत्याग्रह को शिद्दत से दिखाती है। पीटर मारित्जबर्ग के सूने प्लेटफ़ॉर्म पर फ़ेंक दिए जाने से मोहनदास का आत्मसम्मान अपमानित हुआ और उन्होंने गुलाम देश के नागरिकों को सम्मान दिलाने का प्रण किया। फ़िल्म पात्र के अंतर में पैठ कर उसके मनोविज्ञान का अध्ययन करती है एवं उसके मानसिक द्वंद्व को दर्शक तक पहुँचाती है।

फ़िल्म गांधी के त्याग-बलिदान को रेखांकित करती फ़िल्म कई दृश्यों, जैसे मोहनदास करमचंद का अश्वेत होने के कारण, आधिकारिक टिकट होने के बावजूद सत्ता द्वारा ट्रेन से फ़ेंका जाना, गुस्से और जिद में कस्तूर बा को गर्भावस्था में घर से बाहर निकालना, श्वेत मालिक से कोड़े की चोट खाए अश्वेत के घावों पर मलहम लगाना आदि के लिए स्मरण रखी जाएगी।
रजित कपूर युवा गांधी के लिए पुरस्कृत हुए। गांधी न तो बौद्धिक थे, न राजनेता और न ही समाज सुधारक या धार्मिक लेकिन करोड़ों लोगों के पूज्य बने, उद्धारक बने, फ़िल्म यह सब पुरजोर ढ़ंग से प्रदर्शित करती है। 

गांधी दुनिया से जुड़े लेकिन अपने ही बच्चों से न जुड़ सके। गांधी (दर्शन जरीवाला) और उनके बेटे हरि लाल (अक्षय खन्ना) के रिश्तों को लेकर 2007 में फ़िरोज अब्बास खान ने ‘गांधी माई फादर’ फ़िल्म बनाई। जरीवाला को इसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यह फ़िल्म पिता-पुत्र के नाजुक संबंधों की पहचान करती है।

जून 1948 में एक भिखारीनुमा नशे में धुत्त आदमी अपने पिता का नाम गांधी बताता है। पहले लोग समझ नहीं पाते हैं, बाद में पता चलता है यह पिता, परिवार, समाज से उपेक्षित, जीवन से निराश-हताश गांधी का बेटा हीरालाल गांधी है। पूरी फ़िल्म फ़्लैशबैक में चलती है।
गांधी 1906 में दक्षिण अफ़्रीका चले जाते हैं, वहाँ वे घटनाचक्र मे पड़ते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता, और राजनैतिक नेता के रूप में उभरते हैं। इस बीच भारत में रह गया उनका बेटा हरिलाल गुलाब (भूमिका चावला) से शादी करता है। मगर उसे गुलाब को छोड़ कर दक्षिण अफ़्रीका, डरबन जाना पड़ता है। यहाँ बा के किरदार में शैफ़ाली शाह है। फ़िल्म पीढ़ियों की सोच की खाई को प्रदर्शित करती है।

एक ने खुद को देश के लिए कुर्बान कर दिया तो दूसरे ने पिता द्वारा अनदेखी किए जाने पर खुद को नष्ट कर डाला। माँ के प्रति समर्पित हीरालाल एक दिन अपने पिता से कहता है, ‘आप जो भी हैं इसके (‘बा’) और मात्र इसके कारण हैं।’ हीरालाल बैरिस्ट्री पढ़ने इंग्लैंड जाना चाहता था गांधी उसे समाज सेवा में जोड़ना चाहते थे। कुंठित-भ्रमित हीरालाल शराब के नशे में खुद को डुबो लेता है, इस्लाम का रास्ता अपनाता है।

136 मिनट की धीमी गति से आगे बढ़ती हुई फ़िल्म उसकी हताशा-निराशा को चित्रित करती है। फ़िल्म श्वेत-श्याम फ़ुटेज का प्रयोग करती है। पियुष कनौजिया के संगीत से सजी फ़िल्म उन्हीं के नाटक, ‘गांधी वर्सेस महात्मा’ पर बनी है। पुरस्कार से नवाजी फ़िल्म गांधी को कमतर नहीं दिखाती है। 

आगे हम गांधी जी पर बनी सर्वोत्तम फ़िल्म को देखेंगे।


आगे पढ़िए गांधी और सिनेमा श्रृंखला का छठा भाग-  परदे पर अमर महात्मा गांधी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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