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विपक्षी एकजुटता और संकट का दौर: एकता का यह राग इतना आसान नहीं

Hari Verma हरि वर्मा
Updated Mon, 26 Sep 2022 04:58 PM IST
सार

2024 लोकसभा चुनाव से पहले सियासी घटनाक्रमों से विपक्षी एकजुटता से पहले आंतरिक संकट का दौर शुरू हो गया है।

राजस्थान, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के घटनाक्रम से भाजपा के मुकाबले एकजुट विपक्ष की सियासी खिचड़ी का जायका बदलता नजर आ रहा है। ऐसे में मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा का राग इतना आसान नहीं है।   

इस समय दो चुनावों के लिए सियासी खिचड़ी पक रही है।
इस समय दो चुनावों के लिए सियासी खिचड़ी पक रही है। - फोटो : Social Media
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विस्तार

इस समय दो चुनावों के लिए सियासी खिचड़ी पक रही है। चूल्हे पर हांडी भी चढ़ चुकी है। एक ओर, 2024 लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकजुटता की सियासी खिचड़ी की हांडी चूल्हे चढ़ गई है, तो दूसरी ओर सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के संगठन चुनाव की हांडी चूल्हे पर है।



पिछले 24 घंटे के भीतर हरियाणा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के सियासी घटनाक्रम से विपक्षी एकजुटता से पहले आंतरिक संकट का दौर शुरू हो गया है। ऐसे में सियासी खिचड़ी का जायका बदलने या यूं कहें बिगड़ने वाला है। घटनाक्रम से भाजपा बुलंद है। 


संगठन चुनाव से उपजा संकट व कांग्रेस की किरकिरी

सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस संगठन चुनाव को लेकर उलझती नजर आ रही है। पार्टी का दावा है कि वह लोकतंत्र की हिमायती है, इसलिए गांधी परिवार से किसी को थोपने के बजाय चौथी बार चुनाव की दहलीज पर है। राहुल गांधी के ना कहने के बाद अशोक गहलोत का कांग्रेस अध्यक्ष बनना लगभग तय था लेकिन राजस्थान में मुख्यमंत्री की दावेदारी को लेकर रविवार को हुए घटनाक्रम से कांग्रेस की न केवल किरकिरी हुई है बल्कि आलाकमान की सिरदर्दी बढ़ गई है।

यह कांग्रेस का भले आंतरिक संकट हो लेकिन पार्टी को यह सब उस समय झेलना पड़ रहा है, जब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के जरिये हाशिये पर पहुंच चुकी पार्टी को जनता-जनार्दन से जोड़ने के लिए जी-जान से जुटे हैं।


कांग्रेस में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की कुर्सी से खुद की दूरी बनाकर राहुल गांधी बड़ा संदेश देना चाहते हैं लेकिन राजस्थान के राजनीतिक संकट से उनके संदेश पर कांग्रेस की गुटबाजी का संदेश भारी पड़ता नजर आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव को लेकर गहलोत के मुकाबले शशि थरूर की ओर से दावेदारी की जा रही है, वहीं पार्टी में चुनाव को लेकर जी 23 गुट की ओर से बयानबाजी का दौर चल पड़ा है।


राजस्थान से जम्मू-कश्मीर तक खतरे की घंटी

राजस्थान में जब यह सब हो रहा है, तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस से अलग हुए गुलाम नबी आजाद ने अपनी पार्टी डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी का एलान कर दिया। वह भी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस से अलग हुए तो दूसरी तरफ कांग्रेस से अलग हुए पंजाब के कैप्टन अमरिंदर भी इसी दौरान पूरी तरह से भाजपा के हो गए। हाल के इन संकटों की वजह से कांग्रेस की किरकिरी हो रही है।

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खासतौर से तब जब अगले साल ही राजस्थान में विधानसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में राजस्थान में भले कांग्रेस जैसे-तैसे ताजा संकट से उबर भी जाए तो प्रस्तावित राजस्थान के विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर असर पड़ने का खतरा बना ही रहेगा। 

राजस्थान के घटनाक्रम से जहां कांग्रेस की किरकिरी हुई है, वहीं कांग्रेस और भाजपा में फर्क साफ दिखता है।
राजस्थान के घटनाक्रम से जहां कांग्रेस की किरकिरी हुई है, वहीं कांग्रेस और भाजपा में फर्क साफ दिखता है। - फोटो : Social Media

कांग्रेस-भाजपा में फर्क साफ दिखता है

राजस्थान के घटनाक्रम से जहां कांग्रेस की किरकिरी हुई है, वहीं कांग्रेस और भाजपा में फर्क साफ दिखता है। भाजपा ने गुजरात में विजय रुपाणी, कर्नाटक में येदियुरप्पा, असम में सर्बानंद सोनोवाल और उत्तराखंड में त्रिवेंद्र रावत, तीरथ सिंह जैसे कद्दावर सीएम बदले। पार्टी का अंतर्विरोध कांग्रेस की तरह खुलकर सामने नहीं आया।

भाजपा में सभी ने भरे मन से ही सही, हाईकमान के फैसले को सिर आंखों पर लिया। और तो और चुनावी राज्यों में तो सीएम चेहरा बदलने का भाजपा ने फायदा ही उठाया। उत्तराखंड इसकी मिसाल है। जाहिर है राजस्थान का घटनाक्रम जहां कांग्रेस के लिए आपदा है, वहीं भाजपा के लिए यह विधानसभा और लोक चुनाव के लिए अवसर पैदा करता है।      

विपक्षी एकजुटता की हांडी पर आंच

देवीलाल की श्रद्धांजलि के बहाने विपक्षी एकजुटता की हांडी में पक रही खिचड़ी में भी 10 का दम नहीं दिखा। यूं तो 17 दलों के दिग्गजों की जुटान का न्योता था लेकिन केवल 7 ही जुट पाए। कांग्रेस किनारे रही।

तृणमूल कांग्रेस, टीआरएस, डीएमके, बसपा, सपा, बीजद जैसे क्षेत्रीय दल इस खिचड़ी का हिस्सा नहीं बने। फारूख अब्दुल्ला, अखिलेश, ममता, केजरीवाल, राव, देवगौड़ा, नवीन पटनायक, सतपाल मलिक जैसे दिग्गज आमंत्रण के बावजूद शामिल नहीं हुए। अखिलेश की नाराजगी का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि जब नीतीश कुमार के फूलपुर से चुनाव लड़ने की चर्चा उठी तो सपा प्रमुख की प्रतिक्रिया थी- कम से कम चर्चा तो कर लेते।
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मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा का राग आसान नहीं 

नीतीश कुमार चाहते हैं कि विपक्षी एकजुटता की धुरी कांग्रेस बने और यही वजह है कि रविवार को लालू-नीतीश ने सोनिया से मुलाकात भी की लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव और राजस्थान के सियासी संकट में उलझी कांग्रेस से इस भेंट-मुलाकात के दौरान फिलहाल कुछ बात नहीं बनी। संगठन चुनाव और राजस्थान संकट से निपटने के बाद ही कांग्रेस इस दिशा में आगे बढ़ पाएगी। उधर, विपक्षी एकजुटता के हिमायती कई क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस को ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं है।


कांग्रेस इस स्थिति के लिए खुद ज्यादा जिम्मेदार नजर आ रही है। जाहिर है, विपक्षी एकजुटता की हांडी में पक रही खिचड़ी का जायका फिलहाल बदलता नजर आ रहा है। ऐसे में कांग्रेस के सामने जहां पार्टी के भीतर के उठ रहे अलग-अलग सुर को एक सुर में बदलने की चुनौती है, वहीं विपक्षी एकजुटता के लिए बाकी क्षेत्रीय क्षत्रपों के अलग-अलग सुर को भी एक सुर में बदलने की चुनौती है। ऐसे में मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा का राग उतना आसान नहीं है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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