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मौजूदा दौर में राजनीति के गिरते स्तर को कैसे संभालेंगे देश के राजनेता?

Arun TiwariTiwari Tiwari Updated Thu, 14 Mar 2019 02:12 PM IST
राहुल गांधी, पीएम मोदी और आडवाणी जी
राहुल गांधी, पीएम मोदी और आडवाणी जी - फोटो : फाइल फोटो
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एक वकील के घर मिलन के अवसर पर लोकमान्य तिलक द्वारा गुलामी को राजनीतिक समस्या बताने की प्रतिक्रया में स्वामी विवेकानंद ने कहा था - ''परतंत्रता राजनीतिक समस्या नहीं है बल्कि यह भारतीयों के चारित्रिक पतन का परिणाम है।'' बापू को लिखी एक चिट्ठी के जरिए लॉर्ड माउंटबेटन ने भी चेताया था- ''मिस्टर गांधी क्या आप समझते हैं कि आजादी मिल जाने के बाद भारत.. भारतीयों द्वारा चलाया जाएगा। नहीं! बाद में भी दुनिया गोरों द्वारा ही चलाई जाएगी''।
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दरअसल, यही बात बहुत पहले अपनी आजादी के लिए अकबर की शंहशाही फौजों से नंगी तलवार लेकर जंग करने वाली चांदबीबी की शौर्यगाथा का गवाह बने अहमदनगर फोर्ट में कैद ब्रितानी हुकूमत के एक बंदी ने एक पुस्तक में लिखी थी।

विश्व राजनीति की कूटनीति पर नेहरु ने भी यही कहा था
'ग्लिम्सिस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' के जरिए पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक साम्राज्यवाद का खुलासा करते हुए 1933 में लिखा था - ''सबसे नये किस्म का यह साम्राज्य जमीन पर कब्जा नहीं करता; यह तो दूसरे देश की दौलत या दौलत पैदा करने वाले संसाधनों पर कब्जा करता है। आधुनिक ढंग का यह साम्राज्य आंखों से ओझल आर्थिक साम्राज्य है'' ।

आर्थिक साम्राज्य फैलाने वाली ऐसी ताकतें राजनैतिक रूप से आजाद देशों की सरकारों की जैसे चाहे लगाम खींच देती हैं। इसके लिए वे कमजोर, छोटे व विकासशील देशों में राजनैतिक जोड़-तोड़ व षडयंत्र करती रहती हैं। ऐसी विघटनकारी शक्तियों से राष्ट्र की रक्षा के लिए चेताते हुए पंडित नेहरु ने इसे अंतर्राष्ट्रीय साजिशों का इतना उलझा हुआ जाल बताया था कि इसे सुलझाना या इसमें एक बार घुस जाने के बाद बाहर निकलना अत्यंत दुष्कर होता है। इसके लिए महाशक्तियां अपने आर्थिक फैलाव के लक्ष्य देशों की सत्तााओं की उलट-पलट में सीधी दिलचस्पी रखती हैं।

कहां है दुनिया के पटल पर भारत? 
दुर्योग से कालांतर में  देश ने इन दर्ज बयानों को याद नहीं रखा। आजादी बाद कांग्रेस को भंग कर लोक सेवक मंडल गठन के गांधी संदेश की दूरदृष्टि को भी देश भूल गया। स्मृति विकार के ऐसे दौर में भारतीय लोकनीति, रीति और प्रकृति और संस्कार की सुरक्षा कैसे हो? गणतन्त्र के 68वें पड़ाव पार खड़े भारत के समक्ष आज यह प्रश्न बड़ा है और बेचैनी भी बड़ी। ये बेचैनी अभी अलग-अलग है; कल एकजुट होगी; यह तय है।
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