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स्मृति शेष: पुष्पेंद्र सोलंकी हम तुम्हें कभी भूल नहीं सकेंगे

Rajesh Badalराजेश बादल Updated Tue, 05 Mar 2019 09:04 AM IST
मैंने उसके आक्रोश में एक ईमानदारी देखी.
मैंने उसके आक्रोश में एक ईमानदारी देखी. - फोटो : Journalism
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1980 के आसपास की बात है। मैं नई दुनिया, इंदौर में सह संपादक था। एक दिन एक नौजवान मिलने आया। वह झाबुआ के भीलों, भिलालों तथा अन्य आदिवासियों के कुछ मसलों पर बहुत ग़ुस्से में था। संपादक के नाम पत्र तो वह अलीराजपुर से पहले ही लिखा करता था। मैं ग्रामीण मुद्दों के लिए बेहद लोकप्रिय स्तंभ 'परिवेश' का भी प्रभारी था। मैंने उसके आक्रोश में एक ईमानदारी देखी। उससे कहा कि 'परिवेश' के लिए लिखना शुरू कर दो। जहां तक मुझे याद है, उसकी पहली रिपोर्ट ही धमाकेदार थी। वह आदिवासियों को ज़िंदा ज़मीन में गाड़ देने के बारे में थी। वे कुष्ठ रोगी थे। उन्हें जीवित दफ़न कर दिया गया था। पुष्पेंद्र की इस रिपोर्ट ने धमाका कर दिया। सरकार के गृह विभाग को जांच का आदेश देना पड़ा। इसके बाद पुष्पेंद्र मेरे पसंदीदा पत्रकारों में से एक था। उसके आलेख आते रहे। मैं छापता रहा। उन दिनों अलीराजपुर से पुष्पेंद्र सोलंकी, महू से योगेश यादव और दिनेश सोलंकी,कुक्षी से रमन रावल और चंदा बारगल, थांदला से सुरेंद्र कांकरिया पसंद किए जाने वाले नाम थे। चंदा तो नई दुनिया में ही थे। झाबुआ के 'फोटू वाले बाबा पारीक' के अनेक फोटो हमने पुष्पेंद्र के आलेख के साथ प्रकाशित किए। 
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