लोकप्रिय और ट्रेंडिंग टॉपिक्स

Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   rajasthan congress crisis, 'Internal politics goes on know its impact

कांग्रेस संकटः परछाई से उबरने की कोशिश में कांग्रेस की खेवनहार गांधी-नेहरू परिवार

Hari Verma हरि वर्मा
Updated Thu, 29 Sep 2022 06:44 PM IST
सार

1947 से अब तक के 75 साल के सफर में कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी 41 साल तक नेहरू-गांधी परिवार के पास रही। इस परिवार से जुड़े महज 5 चेहरे पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया और राहुल के पास अध्यक्ष की कुर्सी रही, जबकि बाकी के 34 साल में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के 13 चेहरे रहे।

कांग्रेस पार्टी में छिड़ी हुई है सियासी कलह
कांग्रेस पार्टी में छिड़ी हुई है सियासी कलह - फोटो : Twitter
विज्ञापन
ख़बर सुनें

विस्तार

कांग्रेस में जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत ने खुल जा सिम-सिम की तरह अपने पत्ते खोल दिए हैं। सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद गहलोत ने साफ कर दिया कि वह अब कांग्रेस अध्यक्ष की दौड़ से बाहर हैं। राजस्थान के घटनाक्रम की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से मना कर दिया है। वह राजस्थान के सीएम बने रहेंगे या नहीं, यह फैसला हाईकमान यानी सोनिया गांधी पर छोड़ दिया है। इससे कांग्रेस फिर से चौतरफा आंतरिक मुसीबत में घिरी नजर आ रही है। 

कांग्रेस में ऐसा संकट पहली बार नहीं

जब-जब कांग्रेस ने नेहरू-गांधी परिवार के साये से उबरने की कोशिश की है, तब-तब उसे नुकसान झेलना पड़ा है। यह कोई पहला मौका नहीं, जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर पार्टी में अंतर्विरोध के सुर सुनाई पड़े हैं।


 

नेहरू-गांधी परिवार को पहली बार ऐसे ही संकट से 1950 में जूझना पड़ा था। तब पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय आचार्य जेबी कृपलानी और पुरुषोत्तम दास टंडन राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए आमने-सामने हो गए थे। नेहरू की मर्जी के खिलाफ  टंडन ने कृपलानी को हरा दिया था। नेहरू के दबाव में बाद में टंडन को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। अतीत की इस घटना का जिक्र इसलिए जरूरी है कि आज फिर कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार की छाया से उबरने की चाह में है। 


राहुल गांधी ने तय कर लिया है कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। गांधी परिवार की पहली पसंद अशोक गहलोत ने दोनों पदों (राजस्थान के सीएम और राष्ट्रीय अध्यक्ष) की चाह में कांग्रेस अध्यक्ष पद को या तो ठुकरा दिया या राजस्थान के हालात से उनके हाथ से यह अवसर निकल गया। माना तो यह जा रहा है उन पर हाईकमान का भरोसा टूटा, लेकिन हाईकमान के लिए उन्होंने चौतरफा मुसीबत खड़ी कर दी है। वह न राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते और न राजस्थान की सीएम कुर्सी छोड़ना चाहेंगे।


ऐसे में यदि हाईकमान की ओर से गहलोत को राजस्थान का मुख्यमंत्री बने रहने का अभयदान नहीं मिलता तो वे राजस्थान में खेला करने की स्थिति में होंगे। 

अगले साल ही राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। गुजरात-हिमाचल की चुनावी बेला के साथ-साथ 2024 लोकसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी कांग्रेस को भारत से जोड़ रहे हैं। ऐसे में इस समय कैप्टन अमरिंदर, गुलाम नबी आजाद के बगावती तेवर के बाद गहलोत के तेवर से उबर पाना हाईकमान के लिए बड़ी चुनौती है।

अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष की दौड़ से बाहर
अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष की दौड़ से बाहर - फोटो : Twitter

बिना नेहरू- गांधी परिवार वाली कांग्रेस

1947 से अब तक के 75 साल के सफर में कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी 41 साल तक नेहरू-गांधी परिवार के पास रही। इस परिवार से जुड़े महज 5 चेहरे पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया और राहुल के पास अध्यक्ष की कुर्सी रही, जबकि बाकी के 34 साल में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के 13 चेहरे रहे। जेबी कृपलानी, सीतारमैय्या, पुरुषोत्तम दास टंडन, नीलम संजीव रेड्डी, के  कामराज,निजलिंगप्पा, जगजीवन राम, शंकर दयाल शर्मा, डीके बरुआ, के रेड्डी, पीवी नरसिम्हा राव,सीताराम केसरी। 

गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के इतने चेहरे का कार्यकाल संगठन, विस्तार और कार्यकाल के लिहाज से गांधी-नेहरू परिवार के चेहरे की तुलना में कमतर ही रहा। अब ताजा संकट ने भी साबित कर दिया है कि गांधी परिवार की परछाई से उबर पाना इतना आसान नहीं है। कांग्रेस को खेवनहार की जरूरत है और वह गांधी परिवार ही है। 
 

चुनावी बिसात-कांटे का ताज 

आजादी के 75 साल में महज चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव की बिसात बिछी है। नामांकन का आखिरी समय सामने है। इस बार शशि थरूर ने पहले ही अपनी उम्मीदवारी का एलान कर रखा है। अब दिग्विजय सिंह ने नामांकन फॉर्म खरीदा है। मतदान के आखिरी तिथि से एक दिन पहले तक एक भी नामांकन नहीं हो पाया है। पवन बंसल ने चार फॉर्म खरीदे हैं। सो इस चुनाव में कई चेहरे आमने-सामने होंगे।
 
सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर विरोधी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने चुटकी ली है कि कांग्रेस अब केवल भाई-बहन की पार्टी रह गई है और यह क्षेत्रीय पार्टी बन कर रह गई है। चुनावी रैलियों में तो नरेंद्र मोदी बकायदा कांग्रेस को परिवारवादी पार्टी करारते रहे हैं।

 विरोधी भले जो कहें लेकिन ताजा घटनाक्रम और पार्टी के अंदरूनी संकट ने फिर से यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस की असली खेवनहार गांधी परिवार ही है। गांधी परिवार को कांग्रेस को 2024 के चुनावी रेस में लाने के लिए उन विपक्षी गठबंधनों में भी अपनी मजबूत बढ़त बनानी होगी, पार्टी को आंतरिक संकट से उबारना होगा और जनता-जनार्दन से जुड़ना होगा। गांधी परिवार कैसे इन चुनौतियों से उबरती है, यह दिलचस्प तो होगा ही, साथ ही नए अध्यक्ष के लिए कांटे का ताज भी तय हो गया है। 



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
एप में पढ़ें
जानिए अपना दैनिक राशिफल बेहतर अनुभव के साथ सिर्फ अमर उजाला एप पर
अभी नहीं

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00