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सियासी संकट: राजस्थान की राजनीतिक उठापटक में गांधी परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 27 Sep 2022 07:54 PM IST
सार

गहलोत और पायलट के बीच आपसी विग्रह नई नहीं है। वर्ष 2018 की सर्दियों में जब कांग्रेस पार्टी साधारण बहुमत से राजस्थान की सत्ता में लौटी थी, तब पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की बात थी, क्योंकि उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था। उस समय अशोक गहलोत ने सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी को अपने पक्ष में कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा कर लिया था।

अशोक गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नामांकन पर बनी संकट
अशोक गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नामांकन पर बनी संकट - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार

मुख्यमंत्री की कुर्सी से चिपके रहने का मोह अशोक गहलोत छोड़ नहीं पा रहे हैं। कुर्सी का मोह छूटे भी तो उस पर घोर प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट ना बैठें, इसके लिए सभी अस्त्र-शस्त्र निकालकर 45 वर्षों की वफादारी को भुलाकर वो खुलकर सामने आ गए हैं। कुल मिलाकर अब तक गांधी परिवार का सच्चा सिपहसालार कहे जाने वाले अशोक गहलोत का जो चेहरा सामने आया है, उसने सभी को आश्चर्य में डाल दिया है, क्योंकि कुछ महीने पहले जब पंजाब में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में अशोक गहलोत सबसे आगे थे। उस समय गांधी परिवार के प्रतिनिष्ठा की बात थी। अब जब खुद की कुर्सी पर बात बन आई है तो सारी निष्ठा तार-तार हो गई है। 



पिछले रविवार को जो प्रकरण हुआ, उसने गांधी परिवार के आलाकमान की छवि को भी धूमिल कर दिया है, यानी अब साफ है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी पर परिवार की वह पकड़ नहीं रह गई, जो पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के समय में हुआ करती थी।


अब तो अशोक गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नामांकन की बात भी खटाई में पड़ गई है। संशय है कि अब संभवतः वह राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नामांकन भी ना करें। तर्क वही, बहुमत में विधायक नहीं चाहते कि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ें और यदि छोड़ें तो राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद छोड़ें। मानेसर प्रकरण के समय सरकार बचाने वाले 102 विधायकों में से किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाए। 

राजस्थान में सियासत की करवट 

अशोक गहलोत के लिए अब जब बात राष्ट्रीय अध्यक्ष का नामांकन ना भरने पर आ गई है तो फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तो बने ही रहेंगे। इधर-उधर के जो नाम चल रहे थे, वह अब करीब-करीब शांत होते दिख रहे हैं। अब तो यही है कि पहले कैसे राजस्थान को संभाला जाए? इस पूरे घटनाक्रम ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की हवा निकाल दी है। अब भारत जोड़ने से ज्यादा कांग्रेस जोड़ने पर फोकस हो गया है।

 

गहलोत और पायलट के बीच आपसी विग्रह नई नहीं है। वर्ष 2018 की सर्दियों में जब कांग्रेस पार्टी साधारण बहुमत से राजस्थान की सत्ता में लौटी थी, तब पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की बात थी, क्योंकि उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था। उस समय अशोक गहलोत ने सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी को अपने पक्ष में कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा कर लिया था, जबकि राहुल गांधी को सचिन पायलट के पक्ष में बताया जा रहा था।


तब भी एक प्रकरण ऐसा हुआ था, जिसने गहलोत और पायलट के बीच दूरियों को बढ़ाया था। उस समय दिल्ली से जयपुर लौट रहे अशोक गहलोत को एयरपोर्ट से वापस पार्टी नेतृत्व के पास लौटना पड़ गया था। मानेसर प्रकरण के समय तो अशोक गहलोत की कुर्सी जाते-जाते बची थी। उस दौरान उन्होंने सचिन पायलट को नाकारा-निकम्मा तक कह डाला था। पायलट को प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री पद से निष्कासित कर अपने विश्वसनीय नेताओं को बैठा दिया था।

सचिन पायलट के हाथ फिर आते-आते रह गई सीएम की कुर्सी
सचिन पायलट के हाथ फिर आते-आते रह गई सीएम की कुर्सी - फोटो : Twitter

सीएम की कुर्सी फिलहाल पायलट की पहुंच से दूर


एक सवाल जो राजनीतिक हलकों में पिछले चार-पांच दिनों से घूम रहा है, वह यह है कि क्या कारण है, जो गहलोत कैंप इतना आक्रमक हो गया? दरअसल, जिस दिन अशोक गहलोत को सोनिया गांधी ने दिल्ली बुलाया था और राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए कहा था, उसी के आसपास सचिन पायलट ने भी दिल्ली में आलाकमान से मुलाकात की थी।

यदि उसी दिन अशोक गहलोत से इस्तीफा ले लिया जाता और सचिन पायलट के नाम का ऐलान कर दिया जाता तो यह किस्सा वहीं खत्म हो जाता, लेकिन गहलोत कैंप को पूरा स्पेस दिया गया। साथ ही, पायलट गुट ने भी अतिउत्साह में सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर बढ़-चढ़कर सचिन के लिए प्रचार शुरू कर दिया। सचिन पायलट ने भी ऐसा व्यवहार किया, जिससे साफ झलक रहा था कि उन्हें आलाकमान ने हरी झंडी दे दी है और अब वही अगले मुख्यमंत्री होंगे। 

साथ ही, एकाएक जयपुर में विधायक दल की बैठक बुला ली गई। राजस्थान के कांग्रेस प्रभारी अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे को पर्यवेक्षक बनाकर भेज दिया गया।  सारा खेल यहीं से शुरू हुआ। अशोक गहलोत को लगा कि उनके साथ कोई खेल हो रहा है, उन्हें फंसाया जा रहा है।

गहलोत गुट के शांति धारीवाल, प्रताप सिंह खाचरियावास, संयम लोढ़ा, सुभाष गर्ग समेत कई नेता मुखर हो गए। राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने अपनी चाल चल दी। रविवार शाम को नाटक से पर्दा उठा और इस्तीफों की झड़ी के बीच न केवल कांग्रेस आलाकमान की जगहंसाई हुई, बल्कि अति आत्मविश्वास में डूबे पायलट के फिलहाल मुख्यमंत्री बनने पर पूर्णविराम लग गया।


बिखरते कांग्रेस को बचाना पहला लक्ष्य

गांधी परिवार के लिए अब राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना प्राथमिकता नहीं रह गया है। पहले बिखरती कांग्रेस को राजस्थान में संभालने की चुनौती सामने खड़ी है। वैसे सोशल मीडिया पर पायलट कैंप अब बेहद आक्रमक है और अशोक गहलोत के लिए जमकर अपशब्द कह रहा है। कुछ नेताओं ने तो यहां तक लिख दिया है कि वह जादूगर नहीं गंदगी हैं।

अगले एक-दो दिन राजस्थान में कांग्रेस के लिए संकट वाले रह सकते हैं। असली परीक्षा अब आलाकमान यानी गांधी परिवार की है। सोनिया गांधी के पास एक सख्त मुखिया बनने का अवसर है। या तो यहां से बची-खुची कांग्रेस बिखर जाएगी या संभल जाएगी। वैसे जो हालात हैं, उसमें तो यही प्रतीत होता है कि अब पानी बह चुका है।
 
कांग्रेस और राजस्थान के राजनीतिक हालातों पर भारतीय जनता पार्टी की नजर भी बनी हुई है। उनके नेता केवल कांग्रेस की उठापटक पर कटाक्ष कर रहे हैं। सरकार गिराने या अपनी सरकार बनाने जैसे बातें नहीं हो रही है।

वर्ष 2020 में जब सचिन पायलट ने बगावत करके 19 विधायकों को अपने साथ कर लिया था, तब भाजपा पर सरकार गिराने या अस्थिर करने के आरोप लगे थे। इस बार पार्टी यही जताने में लगी है कि उसका पूरे घटनाक्रम से कुछ लेना-देना नहीं है। यह कांग्रेस का अपना झगड़ा है और कुर्सी के लिए पार्टी नेताओं में जूतम-पैजार चल रही है। हालांकि, इस घटनाक्रम के बीच पार्टी को फायदा होता दिख रहा है। 

इन दिनों देश में जिस विपक्षी एकता की बात जोर-शोर से उठाई जा रही है, उसको भी कांग्रेस के इस घटनाक्रम से करारा झटका लगा है। वर्ष 2024 के आम चुनावों में अभी वक्त है, लेकिन बिखरा हुआ विपक्ष ही एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देगा, यह करीब-करीब साफ दिखने लगा है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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