अंतर्ध्वनि: प्रत्येक सर्जक विद्रोही और स्वीकारवादी दोनों होता है

कुबेरनाथ राय Published by: देव कश्यप Updated Wed, 18 Sep 2019 02:55 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
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मैं धार के साथ न बहकर अकेलेे अपने अंदर की कला का अविष्कार करने को कृत संकल्पित हूं। यों यह तो मैं मानता ही हूं कि सर्जक या रचनाकार के लिए 'नॉनकनफर्मिस्ट' होना जरूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती। अतः मुझे भी विद्रोही दर्शनों से अपने को किसी न किसी रूप में आजीवन संयुक्त रखना ही है। एक लेखक होने के नाते यही मेरी नियति है, और इस तथ्य को अस्वीकृत करने का अर्थ है, अपनी सिसृक्षा की सारी संभावनाओं का अवरोध।
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परंतु लेखक, कवि या किसी भी साहित्येतर क्षेत्र के सर्जक या विधाता को यह बात भी गांठ बांध लेनी चाहिए कि शत-प्रतिशत अस्वीकार या 'नॉनकनफर्मिज्म' से भी रचना या सृजन असंभव हो जाता है। पुराने के अस्वीकार से ही नए का आविष्कार संभव है। यह कुछ हद तक ठीक है। परंतु नए भावों या विचारों के 'उद्गम' के बाद 'उपकरण' या अभिव्यक्ति के साधन का प्रश्न उठता है और इसके लिए 'नॉनकनफर्मिज्म' को त्यागकर पचहत्तर प्रतिशत पुराने उपकरणों में से ही निर्वाचित-संशोधित करके कुछ को स्वीकार कर लेना होता है।


रचना की 'आइडिया' के आविष्कार के लिए तो अवश्य 'विद्रोही मन' चाहिए। परंतु रचना का कार्य (प्रक्रिया) आइडिया के आविष्कार के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। रचना-प्रक्रिया में 'स्वीकारवादी मन' की भी उतनी ही आवश्यकता है। अतः प्रत्येक सर्जक या विधाता, जीवन के चाहे जिस क्षेत्र की बात हो, 'विद्रोही' और 'स्वीकारवादी' दोनों साथ ही साथ होता है।

'शत-प्रतिशत अस्वीकार' के फैशनेबुल दर्शन को लेकर बहुत आगे तक नहीं जाया जा सकता है। यह दर्शन विषय और विधा, दोनों की नकारात्मक सीमा बांधकर बैठा है। और इसके द्वारा अपने 'स्व' को भी पूरा नहीं पहचाना जा सकता है; तो 'स्व' से बाहर, इतिहास और समाज को समझने की तो बात ही नहीं उठती।

(हिंदी के दिवंगत साहित्यकार)

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