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मानवता की विजय का उत्सव : रामकथा के पौराणिक मिथक और अपार भौतिक संसाधनों की लालसा के बीच जीवन

Vishwanath Tripathi विश्वनाथ त्रिपाठी
Updated Wed, 05 Oct 2022 06:27 AM IST
सार

अगर विजयदशमी को मानवता की विजय, प्राकृतिक सौंदर्य और वास्तविक रामराज से संयुक्त रखना है, तो हमें सतर्क और सक्रिय रहना पड़ेगा। हमारे समय की विजयदशमी अपने समय के रावण को पहचानने और उस पर विजय प्राप्त करने का आह्वान करती है।

रामलीला
रामलीला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

गांव में मेरे बाबा के साथी शिव बालक साहू हम लोगों से पूछते- दशहरा का मतलब क्या है? हम नहीं बता पाते, तब वह बताते कि दस सिरों वाले रावण को राम ने हराया था, इसलिए इसे विजयदशमी कहते हैं। यह राम की रावण पर विजय का पर्व है। इसके बाद आती है दिवाली- विजय का उत्सव। हमारे मन में आज भी दशहरा का यही रूप और महत्व बसा हुआ है। दशहरा को हम दशभुजा दुर्गा से भी जोड़ते हैं। यह दुर्गा प्रकृतिरूपा हैं-चार दिशाएं (पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण), चार कोण (ईशान, नैऋत्व, आग्नेय, वायव्य) और आकाश एवं धरती-सो प्रकृति ही दशभुजा दुर्गा हैं। 



रामकथा को दुर्गा कथा से जोड़कर राम की शक्ति पूजा की कल्पना कर ली गई। बचपन में दशहरा के दिन हम शाम में नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ मानते थे। मुझे नीलकंठ मोर से ज्यादा सुंदर लगता है। हम मानते थे कि अगर नीलकंठ देख लिया, तो दशहरा शुभ हो गया। उन दिनों नीलकंठ दिखलाई भी पड़ते थे। आजकल शहरों में तो शायद ही नीलकंठ देखने को मिलते हैं। उन दिनों हम सोना लूटने खेतों में जाते थे और लूटते क्या थे, उड़द के पीले फूल। उसे तोड़कर सोना लूटने की कल्पना करते थे। इस तरह रामकथा के पौराणिक मिथक को अपने जीवन में उतार लेते थे। 


सिर्फ लंका का सोना लूटने की कल्पना करके नहीं, बल्कि रामकथा के मंचन में नाना पात्रों के रूपों में शामिल होकर राम के जीवन के साथ स्वयं को जोड़कर अपने सामान्य जीवन को धन्य समझते थे। मिथक तब सिर्फ किताबी शब्द नहीं था, बल्कि वह जीवनोत्सव था। आज भी किसी न किसी रूप में यह जीवनोत्सव जीवित है। खेतों में जाकर उड़द के फूल तोड़ना, नीलकंठ देखना बेशक कम होता जा रहा है, लेकिन रामलीला ज्यादा साधन-सुविधाओं, राजनीति के साथ हो रही है। गांव में जनसामान्य की भागीदारी के साथ ही नहीं, बल्कि विशिष्ट अतिथियों, नागरिकों के आने और शामिल होने के साथ।

गांव में हमारा जीवन रामकथा के पात्रों और स्थितियों से भरपूर था। रामलीला उसी का अंग था। सप्ताह में दो बार-मंगलवार और शनिवार को रामचरित मानस का पाठ होता था। उसमें मोहल्ले के कुंजड़े लड़के भी शामिल होते थे। ढोलक हब्बी यानी हामिद बनाते थे। वह पूजा का प्रसाद भी लेते थे। रामलीला के मुख्य प्रबंधक बुद्धु यानी आबिद थे। गांव के सारे शरारती लड़के उसमें पात्र बनते थे-विशेषतः बानर सेना के पात्र। घर से ही प्रसाधन का सामान जुटाते। 

गांव का सबसे मोटा आदमी रावण बनता और सबसे लंबा आदमी कुंभकरण। कोई खूबसूरत लड़का सीता बनता और सीधा-सादा लड़का राम। लगभग पंद्रह दिन गांव राम-सीता उत्सव में डूबा रहता। यह जरूर है कि इसमें ज्यादातर अनपढ़ और गरीब मुसलमानों के लड़के शामिल होते, पढ़े-लिखे तथाकथित शिष्ट मुसलमान नहीं। मुहर्रम में इसी तरह हिंदुओं के पिछड़े समाज के लड़के शामिल होते। तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदू मुहर्रम में नहीं शामिल होते। यानी दशहरा सांस्कृतिक सहभागिता का उत्सव होता था।

दशहरा जैसे पर्व और उत्सव हमारे देश की प्राकृतिक शोभा और संपदा को जन-जीवन से जोड़कर हमारी परंपरा को समृद्ध और स्वाभाविक बनाते हैं। उत्सव प्रायः दो ऋतुओं के मिलन-संधि, आगमन और फसलों से संबंधित होते हैं। इन ऋतुओं में शरद का विशेष महत्व है, जो वर्षा ऋतु के बाद आती है। वर्षा धन-धान्य की वर्षा का निमित्त बनती है और शरद प्राकतिक सौंदर्य के आस्वाद की ऋतु है। दशहरा केवल राम की विजय का पर्व नहीं, वह राम की विजय को देश की प्राकृतिक सुंदरता से जोड़कर जनमानस की अभिव्यक्ति का उत्सव है। 
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दशहरा के समय आकाश निर्मल हो जाता है, चंद्र ज्योत्सना ज्यादा सुखद लगती है, जल और वनस्पतियों में नया स्वाद आ जाता है, रोगों का प्रकोप शांत हो जाता है। पितर विदा हो चुके होते हैं। योद्धा शस्त्र पूजा करते हैं, व्यापारी व्यापार यात्रा शुरू कर देते हैं। सामाजिक-आर्थिक रामराज तो हम बनाते-बिगाड़ते हैं। प्राकृतिक रामराज का ऋतु शरद है। हर युग में नए राम और नए रावण पैदा होते हैं। शरद काल हर वर्ष आता है और विजयदशमी भी। विजयदशमी स्वाभाविक है और हमारी जरूरत भी, क्योंकि हमारा सांस्कृतिक द्वंद्व भी अनवरत जारी है। 

राम-रावण का युद्ध (दुर्भाग्यवश) सनातन है। अच्छाई और बुराई में द्वंद्व चलता रहता है। इसलिए विजयदशमी विजय का पर्व होने के साथ-साथ विवेक और चिंतन का भी पर्व है। आज विवेक और चिंतन की बहुत जरूरत है और हमारी सांस्कृतिक चेष्टाएं इस दिशा में लापरवाह नहीं हैं। रावण केवल सामने आकर ही नहीं लड़ता था, बल्कि छल-कपट का भी सहारा लेता था। उसने साधु-धर्मात्मा बनकर सीता का अपहरण किया था। वह पुष्पक विमान की सवारी करता था। उसके पास सोने का अपार खजाना था। देवी-देवता उसके दास थे।

रावण रथी, विरथ रघुवीरा -यह स्थिति हमें भ्रमित करती है और निराश भी। हमें विकास और विनाश की परीक्षा करनी है। विजयदशमी के पहले कठिन ग्रीष्म-ताप भी आता है। अकाल, सूखा और बाढ़ भी आती है। इन्हें झेलकर और इनसे बचकर ही हम विजय का पर्व विजयदशमी मना पाते हैं। हमारे देश, समाज और दुनिया के सामने हिंसा, तनाव, कुरीतियां, अंधविश्वास आदि कई तरह की समस्याएं हैं, जिनसे लड़कर हमें विजयी होना है। पर्यावरण संकट, आतंकवाद और भ्रष्टाचार रावण के प्रतीक हैं। 

अपार भौतिक संसाधनों की लालसा और उसका संग्रह आसुरी प्रवृत्ति का लक्षण है। उपभोक्तावादी अपसंस्कृति और उसके ठेकेदार हमारे समय में वास्तविक रामराज के विरोधी हैं। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने पर्यावरण संकट की ऐसी भयावह समस्या पैदा कर दी है कि मानवजाति के अस्तित्व के समक्ष ही संकट खड़ा हो गया है। अगर विजयदशमी को मानवता की विजय, प्राकृतिक सौंदर्य और वास्तविक रामराज से संयुक्त रखना है, तो हमें सतर्क और सक्रिय रहना पड़ेगा। हमारे समय की विजयदशमी अपने समय के रावण को पहचानने और उस पर विजय प्राप्त करने का आह्वान करती है।

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