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पीएफआई के खिलाफ कारगर रणनीति : छानबीन में मिले पुख्ता प्रमाण जुटाने होंगे, तोड़नी होगी कमर

Awadhesh Kumar अवधेश कुमार
Updated Wed, 28 Sep 2022 03:11 AM IST
सार

भारत में पीएफआई का वित्त पोषण करने वालों की बड़ी संख्या है। दूसरे मुस्लिम संगठन ही बताते रहे हैं कि मुस्लिम व्यापारी पीएफआई की मदद कर रहे हैं। इस संदर्भ में पूरी जानकारी इन सबसे समस्त पूछताछ तथा छानबीन के बाद अवश्य सामने आएगी। जाहिर है, जो संपन्न लोग या व्यापारी पीएफआई को धन देते रहे हैं, उनके लिए भी आने वाले दिन कठिन होने वाले हैं।

पीएफआई का स्टेट ऑफिस
पीएफआई का स्टेट ऑफिस - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

पीएफआई यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से जुड़े लोगों और स्थानों पर एक साथ पूरे देश के दस से अधिक राज्यों में छापे तथा सौ से अधिक लोगों की गिरफ्तारियां बताती हैं कि एनआईए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी और ईडी लंबे समय से इसकी तैयारी कर रही थी। लगता है कि केंद्र सरकार ने छिटपुट कार्रवाई के बजाय एक साथ इस संगठन की कमर पूरी तरह तोड़ने तथा हर संभव सबूत इकट्ठा कर सारे संदिग्धों को गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी। 



जैसी आशंका थी, पीएफआई और दूसरे कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन इस कार्रवाई को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे। केरल से लेकर तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र, कर्नाटक और महाराष्ट्र में पीएफआई और उसके समर्थकों ने हिंसक प्रदर्शन किए हैं और आपत्तिजनक नारें लगाए हैं। केरल में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उच्च न्यायालय को इन विरोध प्रदर्शनों का संज्ञान लेना पड़ा। एसडीपीआई यानी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया दावा करती है कि उसका पीएफआई से कोई संबंध नहीं है, पर कई जगह उसके कार्यकर्ताओं ने पीएफआई के साथ न केवल छापे का विरोध किया, बल्कि हिंसक प्रदर्शनों और भारत विरोधी नारों तक में वे लगातार दिख रहे हैं। तो इस सबको किस रूप में देखा जाए? 


कुछ भाजपा व आरएसएस के विरोधियों के लिए पीएफआई के विरुद्ध कार्रवाई भी मुस्लिम विरोधी एवं हिंदू वर्चस्व की कार्रवाई है। आश्चर्य की बात है कि भारत की कोई राजनीतिक पार्टी खुलकर पीएफआई और एसडीपीआई के विरुद्ध कार्रवाई का समर्थन करने या इन दोनों का विरोध करने के लिए सामने नहीं आ रही है। हालांकि केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने स्पष्ट कहा है कि पीएफआई की हड़ताल के दौरान राज्य में हुई हिंसा पूर्व नियोजित थी। 

उन्होंने पीएफआई पर करारा प्रहार किया है। पर उनके शासनकाल में पीएफआई की गतिविधियां खुलेआम चलती रही हैं। केरल के कोच्चि में एनआईए ने पकड़े गए पीएफआई चरमपंथियों को रिमांड पर लेने के लिए जो रिपोर्ट सौंपी, उसमें बताया गया है कि इनके संगठन ने युवाओं को लश्कर-ए-तैयबा और आईएस जैसे आतंकवादी समूहों में शामिल होने के लिए बरगलाया था। यह तर्क दिया जा सकता है कि एनआईए या ईडी ने केवल आरोप लगाए हैं, अभी ये प्रमाणित नहीं हुए हैं। 

बेशक, न्यायालय में आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं, लेकिन देश के सामने पीएफआई क्या है, यह स्पष्ट है। यह भारत की अकेली संस्था है, जिसके विरूद्ध राज्यों में 100 से ज्यादा मामले आतंकवाद विरोधी कानून यानी गैरकानूनी गतिविधियां निवारक कानून के तहत दर्ज हैं। छापे से बरामद दस्तावेज एवं गिरफ्तार पीएफआई सदस्यों से पूछताछ के बाद एनआईए एवं ईडी ने दावा किया है कि इनके निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। 

एनआईए और ईडी के अनुसार, पश्चिम एशिया में आईएफएफ पीएफआई के लिए धन जुटाने का सबसे बड़ा माध्यम बना हुआ है। अकेले संयुक्त अरब अमीरात और अरब देशों से पीएफआई को हर महीने 30 लाख दिरहम यानी करीब 6.7 करोड़ रुपये की फंडिंग होती है। भारत में पीएफआई का वित्त पोषण करने वालों की बड़ी संख्या है। दूसरे मुस्लिम संगठन ही बताते रहे हैं कि मुस्लिम व्यापारी पीएफआई की मदद कर रहे हैं। इस संदर्भ में पूरी जानकारी इन सबसे समस्त पूछताछ तथा छानबीन के बाद अवश्य सामने आएगी। 
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जाहिर है, जो संपन्न लोग या व्यापारी पीएफआई को धन देते रहे हैं, उनके लिए भी आने वाले दिन कठिन होने वाले हैं। जो लोग पीएफआई को प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे थे, उनकी इच्छा पूर्ति का समय आ गया है। किसी संगठन को प्रतिबंधित करने के पूर्व इस तरह के पुख्ता प्रमाण होने चाहिए, जो न्यायालय में खारिज नहीं हों। दूसरे, अब तक का अनुभव है कि प्रतिबंधित किए गए कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों का ज्यादा लाभ नहीं हुआ है, क्योंकि वे दूसरे नाम और मंच के रूप में सक्रिय हो जाते हैं। सिमी पर प्रतिबंध के बाद एक वर्ग ने इंडियन मुजाहिद्दीन बनाया, तो बड़े समूह ने पीएफआई की छतरी ले ली। इसलिए प्रतिबंधित करने के पहले ही उन सारे लोगों की गिरफ्तारियां तथा इनके संसाधनों को खत्म करना बेहतर रणनीति है।

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