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राजपथ से कर्तव्यपथ का गांधी मार्ग : समय बड़ा बलवान और नए प्रतिमान गढ़कर नए जुमलों से भरमाने का सियासी खेल

Sandeep Joshi संदीप जोशी
Updated Sun, 02 Oct 2022 03:28 AM IST
सार

भूलना नहीं चाहिए कि नेताजी ने ही महात्मा गांधी को 'राष्ट्र के पिता' कहकर संबोधित किया था। जबकि गांधी जी ने नेताजी को 'राष्ट्रप्रेम का युवराज' माना। सवाल यह है कि आजादी के पचहत्तर साल के बाद इस मतभेद से भला क्या हासिल हो सकता है।

भारत का लोकतंत्र
भारत का लोकतंत्र - फोटो : iStock
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विस्तार

समय से बलवान न तो कोई सत्ता होती है और न ही कोई सत्तावान। जिस तरह हर मनुष्य के जीवन में एक समय आता है, ठीक उसी तरह निर्जीव प्रतिमाओं का भी एक दिन अंत होता है। दरअसल समय ही बलवान है, जो किंगस्वे से राजपथ बनता है, और वही राजपथ एक दिन फिर कर्तव्यपथ हो जाता है। वर्ष 1939 में राजपथ पर लगी जॉर्ज पंचम की मूर्ति की जगह अब वर्ष 2022 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा सुशोभित है। जो राजपथ गुलामी का प्रतीक था, वह आज कर्तव्यपथ बनकर हमें प्रेरित करने के लिए तैयार है। वह आने वाली पीढ़ी को अपना सामाजिक अतीत भुलाने में, और सांस्कृतिक भविष्य संजोने का रास्ता भी दिखाएगा। मगर सवाल यह है कि इस सब का गांधी जयंती से भला क्या लेना-देना हो सकता है। लेना-देना यह है कि अतीत की याद से और भविष्य की आशा में सत्ता के वर्तमान को समझना भी बहुत जरूरी है।      



एक अंग्रेजी अखबार में भारतीय जनता पार्टी के राम माधव ने यह लिखा कि  स्वतंत्रता का अपना आंदोलन कई तरह से और कई तरीकों से लड़ा गया था। उनका यह भी कहना था कि महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन के अलावा भी अन्य कई नेताओं का स्वतंत्रता के लिए चले आंदोलन में योगदान रहा। राम माधव के लिखे को आगे बढ़ाते हुए हम यह मान सकते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का सशस्त्र, पंडित मदन मोहन मालवीय जी का शैक्षणिक, बाबा साहब आंबेडकर का समतावादी, सरदार वल्लभभाई पटेल का प्रशासनिक, पंडित जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक और ऐसे ही अनेक महानुभावों का सांस्कृतिक तौर पर स्वतंत्रता के आंदोलन में योगदान रहा। मगर इस सच्चाई से कौन इनकार कर सकता है कि इन सभी को एकजुटता में साथ चलाने का काम तो महात्मा गांधी ने ही किया था।


गांधी जी का ही यह मानना था कि आंदोलन केवल अंग्रेजों को भारतीय शासकों से बदलने की इच्छा से प्रेरित न रहे, बल्कि अपने सभ्यतागत गौरव पर लौटने के लिए भी प्रेरित हो। सही समय पर सच्चा नेतृत्व ही अहिंसक सद्भाव में सभी को एक कर्तव्यपथ पर ला सकता है। अहिंसक लोग न तो किसी देश को अपना उपनिवेश बनाने की इच्छा रखते हैं और न ही किसी को औपनिवेशिक शासन के तहत रहने देते हैं। गांधी जयंती के अवसर पर अहिंसक सभ्यता के गौरव को भी समझने की गंभीर कोशिश होनी चाहिए।   

स्वतंत्रता आंदोलन का हमारा इतिहास तो एक ही हो सकता है। बस सरकारें उसे नई तरह से दर्शा कर सत्ता के लाभ में भुनाती चली आई हैं। सच्चाई यह है कि जॉर्ज पंचम की जगह पर किसकी प्रतिमा लगनी चाहिए, इस मुद्दे पर हमारे देश में कई साल तक बहस चलती रही थी। वर्ष 1969 में जब देश में गांधी शताब्दी मनाई जा रही थी, तब वहां महात्मा गांधी की प्रतिमा लगाने के बारे में सोचा गया था। मगर निर्णय उसके बाद भी कई वर्षों तक टलता चला गया था। 

दरअसल महात्मा गांधी के पोते रामचंद्र गांधी का यह विचार था कि प्रतिमा की जगह हमेशा के लिए खाली ही छोड़ दी जाए। खाली इसलिए, ताकि वह भारत के साम्राज्यवाद-विरोध के संकल्प का प्रतीक बनी रहे। लंबी चली बहस में महात्मा गांधी की प्रतिमा न लगाने का, जाहिर है, यह भी एक नजरिया रहा होगा, क्योंकि दुनियाभर में सत्ता द्वारा लगाई गई मूर्ति और प्रतिमाओं का हर्ष आज हम सभी के सामने है। हकीकत यह भी है कि सरकारें बदलती हैं, तो फिर सड़कों के नाम, प्रतिमाएं, मूर्तियां और इतिहास तक बदल दिए जाते हैं।

वर्ष 1968 में राजपथ पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान ही जॉर्ज पंचम की प्रतिमा को नुकसान पहुंचा था। वर्ष 1911 में राजधानी बनने के उपलक्ष्य में जिस दिल्ली दरबार के सजने पर ब्रिटेन के राजा-रानी की प्रतिमाएं दिल्ली में लगाई गई थीं, वे सभी आज पश्चिम से निकली उसी सभ्यता के कचरे में धूल खा रही हैं।
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समझने वाली बात यह है कि महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच मतभेद स्वतंत्रता के लिए चले आंदोलन के साधन पर था, साध्य पर नहीं था। महात्मा गांधी के अहिंसक और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सशस्त्र आंदोलन उनके अपने तरीके थे। उन्हें मनभेद हम आखिर कैसे मान लें? फिर हिंसा भी लंबे समय तक नहीं चलाई जा सकती है। भूलना नहीं चाहिए कि नेताजी ने ही महात्मा गांधी को 'राष्ट्र के पिता' कहकर संबोधित किया था। जबकि गांधी जी ने नेताजी को 'राष्ट्रप्रेम का युवराज' माना। सवाल यह है कि आजादी के पचहत्तर साल के बाद इस मतभेद से भला क्या हासिल हो सकता है। क्या सिर्फ नए प्रतिमान गढ़कर जनता को नए जुमलों से भरमाना और सत्ता का खेल खेलते रहना?

सच बात तो यह है कि जनता को अपना सांस्कृतिक इतिहास किसी सत्ता के आकांक्षी नेता या फिर किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं समझना है। जॉर्ज पंचम से लेकर महात्मा गांधी तक की प्रतिमाओं का इतिहास तो दुनिया भर में खूब देख-समझ लिया गया है। लेकिन महात्मा गांधी के विचारों को गोली नहीं मारी जा सकती। राजपथ को कर्तव्यपथ कर देने भर से राज करने निकली सत्ता कर्तव्य करने लगेगी, इसकी गारंटी कौन लेगा? सत्य और अहिंसा पर विकसित भारत ही वस्तुतः विश्वगुरु बन सकता है।    

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