महामारी में भी चमका सोना: अब भी निवेश का सुरक्षित विकल्प, कोरोना के बावजूद पिछले वित्तीय वर्ष में 2.5 खरब रुपये की खरीदारी

Madhurendra Sinha मधुरेंद्र सिन्हा
Updated Mon, 18 Oct 2021 05:57 AM IST

सार

बेशक पहले की तुलना में सोने की कीमत थोड़ी कम हुई है, लेकिन निवेश के रूप में इसका महत्व अभी बना हुआ है।  
सोना (प्रतीकात्मक तस्वीर)
सोना (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
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विस्तार

सोना पिछले दिनों कोरोना महामारी में ऐसा चमका कि आंखें चौंधिया गईं। हर किसी की पसंद था सोना, नतीजतन उसकी कीमत 55,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से भी ऊपर चली गई। लेकिन जैसे-जैसे महामारी की वैक्सीन बाजार में उतरती गई, वैसे-वैसे सोने की कीमत में भी उतार आता गया। शेयर बाजार की तेजी से भी वह ऊपर-नीचे होता रहा। इसी कड़ी में यह गिरकर 45,000 रुपये रह गया।
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सोना हमेशा निवेश का सुरक्षित माध्यम माना जाता रहा है। महामारी के बावजूद वित्त वर्ष 2020-21 में हमने 2.5 खरब रुपये का सोना खरीदा था। जबकि उसके पिछले साल देश में 1.9 खरब रुपये के सोने की खरीदारी हुई थी। पिछले एक दशक में भारत में सालाना औसतन 800-900 टन सोने का आयात किया गया है। हमने अन्य माध्यमों की तुलना में सोने को हमेशा तरजीह दी। इसका कारण यह है कि सोना थोड़ा-सा भी खरीदा जा सकता है, जबकि निवेश के अन्य साधनों में यह विशेषता नहीं है। सोने के साथ एक और बड़ी बात है कि यह कभी भी बिक सकता है और कहीं भी इसे खरीदा जा सकता है। यूरोप और अमेरिका में सोने के गहने पहनने का रिवाज नहीं, पर वहां के सेंट्रल बैंक अपने पास पर्याप्त मात्रा में सोना रखते हैं। यह उनकी अर्थव्यवस्था को उतार-चढ़ाव से बचाता है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास भी 706 टन सोना है और यह दुनिया में दसवें स्थान पर है। यह रिजर्व सोना हमें विदेशी करेंसी के उतार-चढ़ाव से बचाता है।


वैश्विक महामारी ने अर्थव्यवस्थाओं को हिलाकर रख दिया है। करोड़ों लोगों की आजीविका पर प्रश्नचिह्न लग गया है। मुद्रा का प्रवाह ठहर-सा गया है और रोजगार के रास्ते बंद से हो गए हैं। ऐसे में, लोगों के पास रखा सोना बहुत काम आया है। निवेश के अन्य साधनों की सफलता के अभाव में भी बड़े निवेशकों और वैश्विक सटोरियों ने सोने पर ध्यान दिया। जॉर्ज सोरोस जैसे बड़े खिलाड़ियों ने शेयर में अपने निवेश का बड़ा हिस्सा छोड़कर सोने में लगाया, क्योंकि उन्हें मालूम था कि आने वाला समय सोना खरीदने और बाद में मुनाफा कमाने का है। यही कारण है कि सोना वर्ष 2019 से ही बढ़ना शुरू हो गया, हालांकि बाद में इसके भाव गिरे भी। इसने निवेशकों को फिर से मौका दिया है। लेकिन शेयर बाजार की अभूतपूर्व तेजी से सोने में निवेशकों की दिलचस्पी घट गई और अब वे शेयरों या म्यूचुअल फंड्स में पैसे लगा रहे हैं।

पहले सोना खरीदने के लिए सुनार या बैंकों के पास जाना पड़ता था, पर पिछले कुछ साल से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सोने में निवेश किया जाने लगा है। इस व्यवस्था में सोना खरीदकर घर पर या बैंक में नहीं रखना पड़ता। यह इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में किसी भी तरह के जोखिम से दूर रहता है। म्यूचुअल फंड के जरिये इसमें पैसा लगाया जा सकता है। रिजर्व बैंक के गोल्ड बांड भी उपलब्ध होते रहते हैं। पर उसमें भी सोना घर लाने या अपने पास रखने की सुविधा नहीं है। बहरहाल सोना उन बुलंदियों पर नहीं है और अब यह मौका दे रहा है कि इसकी फिर से खरीदारी की जाए। पर ध्यान रखने की जरूरत है कि इसकी कीमत एक उचित स्तर से ज्यादा न हो। यानी अगर यह 46-47 हजार तक है, तो खरीदारी की जानी चाहिए। ज्यादा महंगा होने पर यह फायदे का सौदा नहीं रहेगा।

सोना अपने निवेश पोर्टफोलियो में जरूर रखना चाहिए, बेशक उसका प्रतिशत कम हो। विदेशी तो मानते हैं कि सोना हमारे कुल निवेश का अधिकतम पांच फीसदी होना चाहिए। पर भारत जैसे देश में, जहां हर कोई लड़की की शादी के लिए मुख्य रूप से सोना खरीदता है, इसका प्रतिशत ज्यादा होना स्वाभाविक ही है। फिर भारत में पुरुष भी सोना पहनते हैं। शादियों में दामाद को सोने की चेन और अंगूठी दी जाती है। ऐसे में यहां सोने में निवेश करना बुद्धिमानी का सौदा है। सोने ने अपने निवेशकों को कभी निराश नहीं किया है। अगर हम सोने के पिछले 70 साल की कीमत पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि इसका दाम थोड़ा-थोड़ा बढ़ता ही रहा है। फिलहाल बाजार अब पूरी तरह से खुले हैं और दशहरे के बाद अब दिवाली की बारी है, जिसमें धनतेरस में सोना खरीदने की परंपरा रही है।

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