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हमारे दौर का 'हिंद स्वराज' : गांधी की सत्याग्रह की कल्पना और मौत को तकिया बनाकर सोने वाली प्रजा

Raghuraj Singh रघुराज सिंह
Updated Sun, 02 Oct 2022 08:19 AM IST
सार

हिंद स्वराज पर बहुत कुछ लिखा गया है और पूरा देश गांधी के होने के डेढ़ शतक मना चुका है। उनकी तस्वीर हर पुलिस थाने में है और करेंसी नोट पर भी। गांधी स्कूल में हैं, पंचायत में हैं, गांधी सत्ता और विपक्ष दोनों के प्रिय हैं। दो अक्तूबर के दिन देश गांधीमय हो जाता है।

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी - फोटो : pexel
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विस्तार

बीसवीं सदी का हिंदुस्तान कैसा होगा? इसका फैसला दो अक्तूबर, 1869 को ही हो गया था। यह वह दिन था, जब पोरबंदर के गांधी खानदान में मोहनदास का जन्म हुआ था। नियति ने उसी दिन हिंदुस्तान की बागडोर मोहनदास के खाते में लिख दी थी। उस मोहनदास के, जो अपनी किशोरावस्था तक दब्बू और डरपोक बना रहा।



इसी मोहनदास ने महात्मा होने और फकीरी बाना पहनने के बहुत पहले वर्ष 1909 में एक छोटी-सी किताब हिंद स्वराज लिखी थी, जो हिंदुस्तान- खासकर आजाद हिंदुस्तान और उसके नागरिक कैसे हों और उसे वे कैसा बनाएं– यह बताती थी। यह किताब 113 साल बाद, आज 21वीं सदी में भी पूरी प्रासंगिकता के साथ मौजूद है। बहुतेरों ने इसे पढ़ा, उससे कम ने इसे गुना और इस पर चलने वाले तो और भी कम रहे।


हिंद स्वराज लिखते वक्त गांधी की उम्र महज चालीस साल थी। गांधी ने यह किताब उन दस दिनों में लिखी थी, जब वह लंदन से दक्षिण अफ्रीका का समुद्री सफर ’किल्डोनान कैसल’ जहाज से कर रहे थे। दस दिनों में लिखी यह किताब बहुतों के लिए आज भी ‘लाइट-हाउस’ है। इसी यात्रा में उन्होंने टालस्टाय के ए लेटर टू ए हिंदू का अनुवाद भी किया था।

जब से लिखी गई है, तब से आज तक हिंद स्वराज की व्याख्या, पुनर्व्याख्या होती रही है। सभी दौरों में सत्ता ने या तो इससे दूरी बनाए रखी है या फिर दबी जुबान से इसे अव्यवहारिक बताती रही है। बहरहाल, देश और दुनिया अब इतने आगे बढ़ चुकी है कि अस्सी सफों का यह दस्तावेज अब मात्र संकेतक रह गया है, जो बताता है कि गुजरे सौ सालों में सभ्यता और विकास के क्रम में चूक कहां हुई है।

हिंद स्वराज लिखने का फॉर्मेट बिलकुल ही अलहदा है। किताब बातचीत की शैली में है। पाठक, उन सब विषयों पर जो सभ्यता और समय को परिभाषित करने के लिए अनिवार्य हैं, सवाल करता है और संपादक इसका जवाब देता है। पाठक और संपादक, दोनों ही गांधी खुद हैं। दिमाग का क्या ही अद्भुत बौद्धिक बंटवारा है, जिसमें दो खाने हैं और दोनों ही आपस में जूझ रहे हैं। गांधी चाहे जितने अहिंसक और सरल हों, इस सवाल-जवाब में वह पूरी तरह से आक्रामक हैं और जवाबों में तो उनकी अक्खड़ता छुपाये नहीं छुपती।

गांधी को आजादी के बाद होने वाली घटनाओं को लेकर जो शकाएं थीं, वे सब सच सिद्ध हुईं। गहरे और व्यापक अर्थों में हिंद स्वराज एक ऐसा दस्तावेज है, जिसके निष्कर्ष आज सही सिद्ध हो रहे हैं। ब्रिटेन की पार्लियामेंट के विषय में गांधी की राय 19वीं सदी के आखिरी सालों और 20वीं सदी के पहले दशक में बनी थी। इसके बाद के सौ सालों में टेम्स में बहुत पानी बह गया है। 
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पानी तो आजादी के बाद के 75 सालों में हिंदुस्तान की नदियों में भी इतना बहा है कि कई एक नदियां सूख तक गई हैं। इस दौर में हिंदुस्तान की संसद और राज्य की विधानसभाओं में क्या-क्या नहीं हुआ, इसे हम बखूबी जानते हैं। महात्मा होने के काफी पहले गांधी ने ‘मदर ऑफ ऑल पार्लियामेन्ट’ (ब्रिटिश संसद) को जिन मापदंडों पर परखा था, अगर उन पर हमारी संसदीय संस्थाओं, उनके लिए चुने गए सदस्यों को तौलें, तो बापू की नाराजगी की कल्पना करना कठिन होगा। निश्चय ही वह पश्चाताप में आमरण अनशन जरूर करते, शायद अनशन तोड़ने की नौबत ही न आती। हो सकता है कि वह देश में घूम-घूमकर आह्वान करते कि नागरिक वोट देना ही बंद कर दें, वे चुनना ही बंद कर दें।

अपराधी संसदीय संस्थाओं के लिए शान से चुने जा रहे हैं, स्वेच्छा से बिना अपने ‘मालिकों’ से पूछे वे जब चाहें अपने वेतन बढ़ा लेते हैं, मोटर, लालबत्ती और हूटर की आवाजों से गरीब जनता को आतंकित करते हैं। जब चाहते हैं, पाला बदलने का खेल खेलने और दिखाने ‘सात सितारा’ होटलों में पहुंच जाते हैं। कानून बिना बहस-मुबाहिसों के जनता पर लागू कर देते हैं। नागरिकों की आवाज अनसुनी रह जाती है। 

करीब दो साल पहले ‘कृषि कानूनों’ के खिलाफ शांतिपूर्ण ‘किसान आंदोलन’ और इसके कुछ पहले हुआ ‘शाहीन बाग’ आंदोलन गांधी की सत्याग्रह की कल्पना के अनुरूप हैं। ये दोनों आंदोलन गांधी को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि हैं। किसानों को लेकर तो खुद गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा है कि किसान किसी के तलवार-बल के बस में न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, लेकिन किसी की तलवार से डरते नहीं हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बनाकर सोने वाली महान प्रजा हैं।

हिंद स्वराज पर बहुत कुछ लिखा गया है और पूरा देश गांधी के होने के डेढ़ शतक मना चुका है। उनकी तस्वीर हर पुलिस थाने में है और करेंसी नोट पर भी। गांधी स्कूल में हैं, पंचायत में हैं, गांधी सत्ता और विपक्ष दोनों के प्रिय हैं। दो अक्तूबर के दिन देश गांधीमय हो जाता है। हर जगह नए समय के ‘महापुरुष,’ गांधी को भाषणों में समेट रहे हैं। बस एक बात है, देश में कोई गांधी के कहे को नहीं मान रहा, कोई हिंद स्वराज में बताए रास्ते पर नहीं चल रहा। (सप्रेस)

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