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नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती: सुभाष बाबू के प्रति हम अविनम्र कैसे हो गए

gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 23 Jan 2022 07:40 AM IST

सार

आजाद हिंद फौज की रचना जैसे उनके कार्यों को हम इतिहास की एक घटना की तरह देख कर आंख मूंद लेते हैं। उनके शब्दों को जीवन प्रकाश की ओर से देखना शायद हमारी उनके प्रति पहली विनम्रता होगी।
इंडिया गेट पर लगेगी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा
इंडिया गेट पर लगेगी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा - फोटो : ANI
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विस्तार

सुभाष बाबू को देश यदि कृतज्ञ भाव से याद करता है, तो फिर क्या हमें उनके विचारों को युगीन युवाओं में पल्लवित होते नहीं देखना चाहिए? यदि नहीं देख पा रहे, तो फिर हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उनके विचार अब हमारे सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों के लिए अर्थहीन हो गए हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनका एक आदर्श वाक्य यह भी था कि कोई विचार किसी व्यक्ति की मृत्यु के साथ मृत हो सकता है, लेकिन फिर वही विचार हजारों व्यक्तियों में फिर से पल्लवित हो सकता है और होता देखा गया है।

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उनके शब्दों की यह आंच आज उस स्मृति के पीछे कहीं निस्तेज पड़ती गई है, जो उनके करिश्माई व्यक्तित्व और 1945 में अचानक उनके अप्रकट हो जाने से भारतीय अवचेतन में रच-बस गई है। देश के बहुसंख्य आवेग ने तो उस अप्रकट सुभाष को फिर से पाना चाहा है और उनकी ओजप्रवण जीवन शैली का प्रशंसक बना रहना चाहा है, लेकिन उनके प्रति बनी यह स्मृति और विस्तृत होकर उनके जीवन मूल्यों को समय के इस नए भारतीय दृश्य में देखना और उनका अध्ययन करना क्यों नहीं चाहती?


हम इतने अविनम्र कैसे होते गए हैं कि हमें एक अविवेकी समाज तो अनासक्त भाव से स्वीकार है, लेकिन आजादी के युगपुरुषों को अपनी प्रशंसित स्मृति में सीमित न कर उनके राजनीतिक मूल्यों को प्रासंगिक शक्ति बना पाने में हम सक्षम महसूस नहीं करते। जिस राजनीतिक अवमूल्यन और सामाजिक अवक्षय से हम व्यापक रूप से रोज आहत दिखते हैं, उसके निर्णायक समाधान में आंच भरने हम सुभाष बाबू की ओर नहीं देखते। गांधी और विवेकानंद की ओर नहीं देखते।

आजादी के बाद बहुत दिनों तक भारतीय जेहन में सुभाष की आंच का मूल्यबोध चहलकदमी करता था। 1950 में बनी फिल्म समाधि के प्रथम दृश्य मे सुभाष चंद्र बोस को मंच से जनता को संबोधित करते दिखाया जाता है, जहां वह कह रहे कि यदि आप मुझे मानते हैं, तो मेरे गले के इस हार की कीमत के लिए बोली लगाइए। जो भी पैसा इकट्ठा होगा वह आजादी की लड़ाई में इस्तेमाल होगा। फिल्म में जापान की भूमिका भी प्रमुख है। सुभाष की भूमिका निभा रहे कलाकार के अलावा इस फिल्म में अशोक कुमार और नलिनी जयवंत मुख्य भूमिकाओं में थे।

इस फिल्म का यहां प्रतिनिधि उल्लेख इसलिए है कि स्पष्ट हो सके कि आजादी मिलने के बाद हम लंबे समय तक किस तरह सुभाष बाबू को मिस करते रहे हैं। यह मिस करना उनके उस व्यक्तित्व के कारण है, जो कुछ ऐसे आदर्श मूल्यों से समृद्ध हुआ था, जो असामान्य हैं, जिन्हें हमें जानना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या ऐसी कालातीत जीवन शैली का कोई वृहत्तर अर्थ नहीं है, जिसके बूते हम आज की मूर्ख वर्जनाओं को विपन्न करना सीखें। यदि हम ऐसा नहीं कर सकते या नहीं कर रहे तो भारतीय राजनीतिक जीवन के प्रथम पुरुषों की जयंती भर मना लेना उन्हीं आडंबरों में से एक है, जो हममें अंधत्व का अंधेरा भरते हैं।

काशी में एक विद्वान हुए हैं क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय। सुभाष बाबू उनके सहपाठी थे। क्षेत्रेश बाबू लंबे समय तक काशी में रहे और दर्शन के क्षेत्र में आलोकवर्षी कार्य किया। उनके बेटे महेश चंद्र चट्टोपाध्याय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर पद से रिटायर हुए। पिछले दिनों महेश दा ने मुझे उन चिट्ठियों का एक पैकेट भेजा, जो सुभाष बाबू और क्षेत्रेश बाबू के बीच एक विशेष कालखंड में संभव हुआ था। चिट्ठियों को पढ़ते हुए यही लगा कि सारे शब्द, सारे अनुच्छेद जीवन मूल्यों की ऐसी आचार संहिता हैं, जिनका प्रयोग दोनों विद्वान जीवन भर करते रहे, जिनका उपयोग हम अपने आत्मिक और सामाजिक उत्तरण के लिए कर सकते हैं।

काशी के ही प्रसाद के नाटक जनमेजय का नागयज्ञ के आरंभिक दृश्य में कृष्ण अर्जुन से कह रहे कि विश्व में अंधेरे और अभाव की सत्ता नहीं है, हम अपनी विश्वदृष्टि को बढ़ाने के लिए क्या कर रहे? इसी विश्वदृष्टि की बात उन चिट्ठियों के शब्द शब्द  में है। दो विद्वानों के बीच अपने-अपने यथार्थ को जीने की आकुलता कैसी हो सकती है, यह इन चिट्ठियों का मुख्य आस्वाद है। उस आकुलता का रचनात्मक आवेग में भावानुवाद कैसे हो सकता है, यह सुभाष बाबू की लगभग सभी चिट्ठियों में महसूस किया जा सकता है। उनकी दैहिक उपस्थिति की पुनरावृत्ति सभी ने चाही, लेकिन उनके मूल्यों को अपने आचरण में उपस्थित कर देने का अदम्य साहस अभी देश की निर्भीकता से नहीं जुड़ पाई है। साहसिक जीवन को आदर्श रूप में पाठ्यपुस्तक में प्रकाशित करना जड़ता है और उसे अपने व्यावहारिक जीवन में स्थान न देना औद्धत्य है।

हम इतने अविनम्र कैसे हो गए? ऐसा कैसे हो सका कि रेडियो से कभी गूंजा यह संबोधन ‘मैं सुभाष बोल रहा हूं’ नए युवाओं के हृदय से कभी नहीं जुड़ सका? आजाद हिंद फौज की रचना जैसे उनके कार्यों को हम इतिहास की एक घटना की तरह देख कर आंख मूंद लेते हैं। उनके शब्दों को जीवन प्रकाश की ओर से देखना शायद हमारी उनके प्रति पहली विनम्रता होगी। अपनी ओर से देश की अनिवार्य रचना होगी। अपदस्थ होती हिंसा को देख हमारा एकांत सुरक्षित महसूस करेगा और हम व्यापक अर्थों में सुभाष बाबू के प्रति कृतज्ञ हो सकेंगे।

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