बिना आग के धुआं: एक भी हिंदू अमेरिकी नागरिक आतंकी घटनाओं में संलिप्त नहीं पाया गया है, फिर यह शोर क्यों?

Virendar Kapoor वीरेंदर कपूर
Updated Mon, 20 Sep 2021 06:40 AM IST

सार

पश्चिम का मीडिया भारत के खिलाफ पक्षपाती है। दूसरों को बदनाम करने से पहले अमेरिका अपने काले अतीत में झांके।
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

अमेरिका को अपने लिए ऊंचे मुकाम पर काल्पनिक घोंसला बनाने में महारत हासिल है। इस क्रम में वह कई बार मूर्ख साबित होता है। वह एक विशाल काल्पनिक मधुमक्खी का छत्ता बनाता है, जो घातक मधुमक्खियों और शुद्ध शहद से भरा होता है, जिसके बारे में वह दुनिया को बताता है कि किसी भी दिन गिर सकता है। फिर वह बिना सुरक्षा के उस पेड़ पर चढ़ जाता है और जब शाखा टूटती है, तो उसकी भी कुछ हड्डी टूट जाती हैं। वह अपने कुछ और दोस्तों को भी उसी पेड़ पर चढ़ने के लिए मना लेता है और उनकी भी हड्डियां तुड़वा देता है। इस बीच बगल के पेड़ से मधुमक्खियों का असली छत्ता टूटकर गिरता है, जिसमें से हजारों मधुमक्खियां इन अमेरिकियों को डंक मारती हैं, जो टूटी हड्डियों के कारण बचने के लिए भाग भी नहीं सकते हैं। इसमें नुकसान उनके उन दोस्तों को होता है, जो इस दुस्साहस में शामिल होते हैं।
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ठीक ऐसा ही हुआ था, जब जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अमेरिकियों से कहा था कि सद्दाम हुसैन अल कायदा के साथ 9/11 हमले की योजना बनाने का जिम्मेदार था, जिसने अपना गुनाह कबूल कर लिया था। उन्होंने कहा कि इराक के पास सामूहिक विनाशक हथियार हैं, और अमेरिकी उसकी मांद में घुसकर उन्हें नष्ट कर देंगे। विदेशमंत्री समेत अमेरिकी प्रशासन के सभी शीर्ष अधिकारी जानते थे कि यह झूठ है, फिर भी उन्होंने राष्ट्रपति की बात मानी और न केवल अमेरिकियों, बल्कि दो दर्जन से अधिक समझदार राष्ट्रों को भी इसका विश्वास दिलाया। फिर वही हुआ कि पेड़ पर चढ़कर अपनी हड्डी तुड़वा बैठे। अमेरिकियों ने अपने 4,000 से ज्यादा सैनिकों को खो दिया। पर एक भी सामूहिक विनाशक हथियार नहीं मिला।

 
फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया। अमेरिकियों ने सोचा था कि वे रूस के करीब में पैठ जमा लेंगे और यह उन्हें स्वर्णिम अवसर दिखा। उनका मानना था कि 9/11 हमले का सरगना ओसामा बिन लादेन अफगानिस्तान में छिपा था। वहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। अमेरिका ने बीस वर्षों तक अफगानिस्तान में अपने सैनिक तैनात किए और अफगान सैनिकों को मुल्क की रक्षा के लिए प्रशिक्षित किया। उन्होंने बीस खरब डॉलर से अधिक के निवेश के बारे में दुनिया के सामने एक और फर्जी रिपोर्ट पेश की! वास्तव में कुछ मुट्ठी भर अमेरिकी कंपनियों ने अफगानिस्तान में हथियारों, रसद और सेवाओं की आपूर्ति के मामले में उससे अधिक कमाई की। फिर पूरे क्षेत्र को खुले घाव के रूप में छोड़ दिया। अमेरिकियों की विश्वसनीयता, खुफिया जानकारी, सामान्य समझ और इरादे को समझने के लिए यह पर्याप्त है।
 
अब वे फिर से हिंदू फोबिया का भ्रम फैलाकर पुरानी चाल चल रहे हैं। इस बार सीधे व्हाइट हाउस इसमें संलिप्त नहीं है, पर कुछ शीर्ष अमेरिकी विश्वविद्यालय (कुछ राजनीतिक लॉबी के मौन समर्थन से इन्कार नहीं किया जा सकता है) और वेटिकन जैसे पश्चिम के कुछ धार्मिक संगठनों और भारत के राजनीतिक विरोधियों का इसमें समर्थन हो सकता है, जो लोकतंत्र के स्वयंभू रक्षक होने का दावा करते हैं। ऐसे लोगों ने ही अमेरिका में हिंदुत्व के विरोध में 'डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व' नाम से एक वर्चुअल कॉन्फ्रेंस का पिछले दिनों आयोजन किया था। ये लोग भारत की मौजूदा सरकार की लोकप्रियता से बुरी तरह परेशान हैं और उन्हें अलोकतांत्रिक साबित करना चाहते हैं। ये हिंदू फोबिया का भ्रम फैलाना चाह रहे हैं। पश्चिमी मीडिया भारत के खिलाफ पक्षपाती है और उसे इसमें शामिल होने में खुशी होगी। यह बिना आग के धुआं फैलाने की सुनियोजित कोशिश है।
 
एक भी हिंदू अमेरिकी नागरिक आतंकी घटनाओं में संलिप्त नहीं पाया गया है, फिर यह शोर क्यों? इसका कोई वाजिब कारण नहीं है। इसके विपरीत पश्चिम में शांतिपूर्वक रहने वाले हिंदुओं पर गोरों द्वारा हमला किया जाता रहा है। हिंदू शांतिप्रिय लोग हैं और उन्होंने विश्व शांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साफ है, अमेरिका फिर बड़ी गलती कर रहा है। उसे पहले अपने घर को व्यवस्थित करना चाहिए। दूसरों को बदनाम करने से पहले वे अपने काले अतीत में झांके। गोरे लोगों का भय वास्तविकता है।

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