समाज को बदलने का स्वप्न: दिव्यांगजन को साथ लेकर चलने की जरूरत

tarun veejay तरुण विजय
Updated Sat, 25 Sep 2021 06:04 AM IST

सार

देश में एक करोड़ के लगभग ऐसे बच्चे हैं, जो किसी प्रतियोगिता में नहीं जा सकते और न ही कभी पदक ला सकते हैं। उनको सदैव किसी के सहारे, स्नेह और अपनेपन की जरूरत होती है, उनके प्रति हम क्या करते हैं? जो जीत नहीं पाते, उनमें भी आगे आने, शाबाशी पाने की इच्छा होती ही है, यह हम क्यों नहीं समझते?
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : a
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विस्तार

एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय असामान्य अराजनीतिक महापुरुष थे, जिन्होंने समाज को बदलने का स्वप्न देखा। वह अपनी चुनावी हार पर भी दुखी नहीं हुए- 'जो जीता है, वह भारतीय ही तो है'! देश में जिनको ‘विशेष सक्षम' कहा जाता है, वह दीनदयाल के प्रिय थे, क्योंकि उन्हें अंतिम पंक्ति में रहने वाले हर व्यक्ति से विशेष आत्मीयता का संबंध महसूस होता था। 
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जो पंक्ति में नहीं, किसी भी कारण से समाज में एकाकीकरण का शिकार हुआ है, दीनदयाल उपाध्याय का प्रिय था। विशेष सक्षम अथवा दिव्यांग इसी वर्ग में आते हैं। हमारा समाज स्वयं को भले ही किसी अहमन्यता के कारण संस्कृति और सभ्यता का मूल आगार कहे, किंतु हम विशेष सक्षम बच्चों और वयस्कों के प्रति सामान्यतः एक निर्मम तथा संवेदनहीन लोग हैं। हम उनको बेचारगी, दया, हमारी कृपा के पात्र मान कर चलते हैं, जिनको कुछ देकर दान-पुण्य का भागी बना जा सकता है। 


वे हमारे अपने हैं, योग्य बनने चाहिए, उसके लिए वातावरण में सहभागीकरण की आवश्यकता है, उनको अलग-थलग करके चलने के बजाय साथ लेकर चलने में ही जीवन का आनंद है, यह भाव भारत में है, लेकिन बहुत कम। पैरालंपिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में जो पदक जीत कर आए और जिन्होंने सहभागिता की, उन दोनों के प्रति देश में एक अच्छा माहौल बना, प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं अगुवाई करते हुए उनको सम्मानित किया, आत्मीयता का बोध कराया। 

यह बहुत बड़ा संदेश दे गया। परंतु देश में एक करोड़ के लगभग ऐसे बच्चे हैं, जो किसी प्रतियोगिता में नहीं जा सकते और न ही कभी पदक ला सकते हैं। उनको सदैव किसी के सहारे, स्नेह और अपनेपन की जरूरत होती है, उनके प्रति हम क्या करते हैं? जो जीत नहीं पाते, उनमें भी आगे आने, शाबाशी पाने की इच्छा होती ही है, यह हम क्यों नहीं समझते?

देहरादून में दिव्यांग क्षेत्र में कार्यरत आयुक्त प्रदीप रावत से पता चला कि पहाड़ तथा देश के विभिन्न भागों से अनेक अभिभावक अपने दिव्यांग बच्चे चुपचाप हरिद्वार में हरकी पैड़ी पर छोड़ जाते हैं। तू यहां बैठ, हम अभी आते हैं, कहकर फिर कभी नहीं आते। परंतु अनेक अभिभावक ऐसे भी हैं, जो जीवन भर अपने बच्चे की चिंता में, देखभाल में समय लगाते हैं। गहरी शारीरिक दिव्यांगता के अलावा प्रत्येक दस नागरिकों में एक पठनीय अक्षमता अथवा न्यून-क्षमता (लर्निंग डिसेबिलिटी ) से प्रभावित होता है। 

पर विडंबना है कि भारत के अधिकांश विद्यालयों में इसकी प्रारंभिक स्तर पर पहचान और निदान का कोई साधन नहीं, व्यवस्था नहीं, विशेष प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति नहीं। फलतः ये बच्चे कुढ़-कुढ़कर जबरदस्ती वह सब करने के लिए मजबूर किए जाते हैं, जो उनकी क्षमता में नहीं होता। दिव्यांगता कानून को कितने विद्यालय लागू करते हैं? क्या इस पर कभी संसद में चर्चा सुनी गई है? 

नहीं, क्योंकि विशेष सक्षम बच्चों के लिए चर्चा करके समय और विवेक खर्च करना राजनीतिक फायदे का विषय है ही नहीं। क्या किसी राजनीतिक दल ने चुनावी घोषणा पत्र में बच्चों के लिए, विशेष सक्षम बच्चों के लिए कभी कोई वादे किए? नहीं। क्योंकि ये विषय किसी के मानसिक रडार पर आता ही नहीं। इसका कोई 'लाभ' होगा, ऐसा माना ही नहीं जाता। 

इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार भारत में विशिष्ट पठनीय अक्षमता से प्रभावित बच्चों की संख्या हर कक्षा में सात से पंद्रह प्रतिशत तक पाई गई है और यह पांच से सात वर्ष की आयु के बालकों में बालिकाओं से ज्यादा है। हम देहरादून में 25 सितंबर को बच्चों की पठनीय अक्षमता पर पहला विमर्श कर रहे हैं, जिसमें सभी स्वयंसेवी संगठन और सरकारी विभाग भाग ले रहे हैं। 

पहले पता तो चले कि कहां तक समाधान के उपाय पहुंचे हैं, कहां पहुंचना बाकी है। फिर यहां से पहाड़ में निदान पहुंचाने की यात्रा प्रारंभ होगी। दिव्यांगजन के प्रति जागरूकता और सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित करना, दीनदयाल उपाध्याय को मानने का यही मार्ग है, जिनकी आज जयंती है।

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