सियासत: अपनों से ही लड़ती कांग्रेस

Awadhesh Kumar अवधेश कुमार
Updated Wed, 22 Sep 2021 06:10 AM IST

सार

जिन परिस्थितियों में कैप्टन अमरिंदर सिंह को सीएम पद से हटना पड़ा, वह दिखाता है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।
राहुल गांधी, नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह
राहुल गांधी, नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

पंजाब के मुख्यमंत्री पद से कैप्टन अमरिंदर सिंह का त्यागपत्र कतई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। पिछले एक वर्ष से पंजाब कांग्रेस के अंदर जो कुछ चल रहा था और केंद्रीय नेतृत्व जिस ढंग से वहां लचर भूमिका में था, उसकी परिणति यही होनी थी। नवजोत सिंह सिद्धू के मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बाद से ही ऐसा लग रहा था, जैसे कांग्रेस के अंदर एक विपक्षी दल खड़ा हो गया है, जो कैप्टन और सरकार की मिट्टी पलीद करने में लगा है। 
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कैप्टन ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा-सबसे संपर्क कर आग्रह किया कि सिद्धू को नियंत्रित करें, उन्हें महत्व न दें, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। कैप्टन अमरिंदर सिंह की इच्छा के विरुद्ध सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। केंद्रीय नेतृत्व ने उनके सामने अगर कोई एक मात्र विकल्प छोड़ा था, तो वह त्यागपत्र ही है। जिन परिस्थितियों में नए मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी ने कमान संभाली है, उसमें उनकी भी राह आसान नहीं है।


जैसे कि जानकारी है, जब कैप्टन ने सोनिया गांधी को फोन कर कहा कि 'मैं त्यागपत्र देने जा रहा हूं', तो उन्होंने केवल इतना कहा, 'सॉरी अमरिंदर, आप त्यागपत्र दे सकते हैं।' इससे कल्पना की जा सकती है कि एक मुख्यमंत्री के रूप में कैप्टन अमरिंदर सिंह की स्थिति क्या हो गई थी। मुख्यमंत्री को पता नहीं हो और विधायक दल की बैठक बुला ली जाए, तो राजनीति में इसके क्या मायने हो सकते हैं? 

कैप्टन के नजदीकी लोग बता रहे हैं कि उन्होंने सोनिया गांधी को कहा कि आपको मेरा काम पसंद नहीं है, तो मुझे भी केंद्रीय नेतृत्व का काम सही नहीं लगता। इसके राजनीतिक मायने हम निकाल सकते हैं। ऐसी भाषा किसी पार्टी की सामान्य अवस्था का प्रमाण नहीं हो सकती। कैप्टन के तौर-तरीकों, काम करने का अंदाज आदि में कुछ दोष हो सकते हैं, आखिर किसी नेता के लिए सबको संतुष्ट करना संभव नहीं है। 

लेकिन पंजाब कांग्रेस के वह लंबे समय से स्तंभ हैं, उन्होंने 2017 में कांग्रेस को तब बहुमत दिलाया था, जब वह देश और राज्यों में बुरे दौर से गुजर रही थी। सिद्धू के एक राजनीतिक सलाहकार ने कश्मीर के भारत के अंग होने से लेकर इंदिरा गांधी की कश्मीर नीति पर भी प्रश्न उठा दिया। एक सलाहकार ट्वीट कर रहे थे कि पंजाब में कांग्रेस जीती, पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं मिला। विचित्र स्थिति है! सिद्धू को अध्यक्ष बनाए जाने को भी कैप्टन ने बेमन से स्वीकार कर लिया। इसके बावजूद क्या समस्या थी? अगर समस्या थी, तो क्या विरोधियों और कैप्टन को साथ बिठाकर केंद्रीय नेतृत्व उसका हल निकालने की कोशिश नहीं कर सकता था?

जो भी हो, कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने सिद्धू और अन्य कैप्टन विरोधियों को महत्व देकर पंजाब में आम आदमी पार्टी के लिए राजनीतिक लाभ की स्थिति बना दी है। इसका असर कांग्रेस की पंजाब इकाई तक सीमित नहीं रहेगा। राजस्थान, छत्तीसगढ़ से लेकर हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड, असम, कर्नाटक, केरल-सब जगह इसकी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ेगी, जहां पार्टी के भीतर अंतर्कलह हैं। 

राजस्थान में सचिन पायलट और उनके समर्थकों को संदेश मिला है कि हमने भी नवजोत सिंह सिद्धू की तरह मुख्यमंत्री का विरोध जारी रखा, अपने साथ विधायकों को मिलाया, दिल्ली गए, मीडिया में बयान दिया, अभियान चलाया तो अशोक गहलोत को जाना पड़ सकता है। यही सोच छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव और उनके समर्थकों के अंदर पैदा होगी। अमरिंदर सिंह ने पद से हटने के बाद सिद्धू के बारे में एक अन्य पहलू की ओर इशारा किया है, जो सामान्य पार्टी राजनीति से परे राष्ट्र के लिए ज्यादा गंभीर हैं। उन्होंने कहा है कि पंजाब सीमा पार पाकिस्तान और आईएसआई के षड्यंत्रों से परेशान है। 

ड्रोन से हथियार आते हैं, आतंकवादी को वहां ट्रेनिंग मिलती है, मादक द्रव्य आ रहे हैं और नवजोत सिंह सिद्धू इतने नाकाबिल व गैर जिम्मेवार हैं कि इमरान खान और वहां के सेना प्रमुख बाजवा के साथ दोस्ती रखते हैं। कैप्टन जिस ओर इशारा कर रहे हैं, वह वाकई गंभीर है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व यानी सोनिया गांधी और उनके परिवार को कैप्टन के इन बयानों पर स्पष्टीकरण अवश्य देना चाहिए।

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