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देर से उठा सही कदम : आतंकवाद के वित्तपोषक संगठनों पर कुठाराघात की जरूरत, पीएफआई पर प्रतिबंध के मायने

विक्रम सिंह विक्रम सिंह
Updated Thu, 29 Sep 2022 07:20 AM IST
सार

इस बार पीएफआई से जुड़े लोगों पर ठोस कार्रवाई हुई है और आगे भी होनी है। तमाम लोगों के बायोमीट्रिक्स, हिस्ट्री शीट और संपत्ति के ब्योरे पुलिस के पास हैं। यूएपीए की जिन धाराओं के तहत कार्रवाई हुई है, उनमें कम से कम चौदह साल की सजा होनी है। बहुतेरे लोगों की पूरी उम्र जेल की सलाखों के पीछे गुजर जाएगी।

PFI का पुतला फूंका
PFI का पुतला फूंका - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

आतंकी फंडिंग और अन्य गतिविधियों के कारण पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई और उसके अनुषंग संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंध का मैं स्वागत करता हूं। यह कदम और पहले उठाया जाना चाहिए था। गौर करने की बात है कि वर्ष 2011 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने डीजीपी के सम्मेलन में यह सूचित किया था कि पीएफआई केरल और कर्नाटक के जंगलों में शस्त्राभ्यास कर रहा है। उसके ग्यारह साल बाद अब जाकर इस पर कार्रवाई हुई है। 



हालांकि पीएफआई के हिंसात्मक क्रियाकलापों को देखते हुए सरकार ने इस पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली थी। इसी के तहत देश भर में पीएफआई से जुड़े लोगों की शिनाख्त के लिए बड़े पैमाने पर और दो बार छापे मारे गए। पहले चरण में 22 सितंबर को एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) और ईडी (प्रवर्तन निर्देशालय) ने देश भर में पीएफआई के दफ्तरों पर छापे मारे और इसके नेताओं/सरगनाओं को हिरासत में लिया और गिरफ्तार भी किया। 


फिर अलग-अलग राज्यों में पुलिस ने 27 सितंबर को इस संगठन के ठिकानों पर छापा मारा और इससे जुड़े और लोगों को शिकंजे में कसा। और अब आखिरकार इस पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया गया है। दक्षिण भारत के तीन मुस्लिम संगठनों-केरल के नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक के फोरम ऑफ डिग्निटी और तमिलनाडु के मनिता नीति पसाराई को मिलाकर पीएफआई का गठन हुआ था। 

सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) और आईएम (इंडियन मुजाहिदीन) पर लगे प्रतिबंध के बाद उभरे इस संगठन ने खुद को अल्पसंख्यकों, दलितों और हाशिये पर के समुदायों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन के रूप में पेश किया। वर्ष 2009 में पीएफआई से ही एसडीपीआई (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया) नाम का राजनीतिक दल निकला। पीएफआई भले चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन एसडीपीआई का दक्षिण भारत के मुस्लिम बहुल इलाकों में असर है। 

दक्षिण कन्नड़ के तटीय इलाकों और उडुपी में उसने न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज की है, बल्कि स्थानीय स्तर के चुनाव में कमोबेश सफलता भी हासिल की है। वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण कन्नड़ से इसके उम्मीदवार खड़े हुए थे, जिन्हें क्रमशः एक और तीन फीसदी वोट मिले थे। लेकिन दक्षिण भारत में बहुत जल्दी पीएफआई का असली चेहरा नजर आ गया। वर्ष 2012 में ओमान चांडी के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया था कि पीएफआई कोई स्वतंत्र संगठन नहीं, बल्कि प्रतिबंधित संगठन सिमी का ही नया रूप है। 

अदालत में हलफनामा दाखिल कर चांडी सरकार ने बताया था कि पीएफआई पर माकपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 27 कार्यकर्ताओं की हत्या के मामले हैं, और हत्या का उद्देश्य सांप्रदायिक है। उसके दो साल बाद केरल सरकार ने अदालत में दाखिल एक दूसरे शपथपत्र में कहा कि पीएफआई का छिपा एजेंडा धर्मांतरण, इस्लाम के हक में मुद्दों का सांप्रदायीकरण और इस्लाम के दुश्मनों का खात्मा करने के लिए कट्टर मुस्लिम युवा तैयार करना है। 
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इन क्रियाकलापों के जरिये वह समाज का इस्लामीकरण करना चाहता है। केरल में पीएफआई की सबसे मजबूत उपस्थिति है, जहां इसके सदस्यों पर हत्या करने, दंगा फैलाने, धमकाने और आतंकी संगठनों से संबंध रखने के आरोप हैं। खुद केरल उच्च न्यायालय इस साल पीएफआई को चरमपंथी संगठन कह चुका है। इसके बाद इसके खतरनाक इरादों के बारे में किसी को संदेह नहीं रह जाना चाहिए। पीएफआई का जन्म भले ही दक्षिण भारत में हुआ हो, लेकिन सुनियोजित तरीके से इसने देश के दूसरे हिस्सों में भी अपने पांव फैलाए। 

इसी के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में भी पीएफआई के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हुई और 50 से ज्यादा जिलों में इसके सदस्यों को पकड़ने का अभियान चलाया गया। उत्तर प्रदेश में पिछले कई साल से पीएफआई के सदस्य सक्रिय थे। लेकिन पुलिस की सख्ती और चौकसी के कारण यहां वे छिप-छिपाकर अपनी गतिविधियां चलाने को मजबूर थे। हालांकि पीएफआई के सबसे ज्यादा सदस्य कर्नाटक में पकड़े गए। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि इसका प्रभाव क्षेत्र दक्षिण भारत में ही ज्यादा है। 

जो लोग यह कह रहे हैं कि सिमी और आईएम पर लगे प्रतिबंध के बाद जिस तरह पीएफआई उभरा, उसी तरह इस पर प्रतिबंध लगने के बाद आने वाले दिनों में ऐसा ही कोई दूसरा संगठन खड़ा हो सकता है, वे बिल्कुल गलत कह रहे हैं। सिमी और आईएम पर जो प्रतिबंध लगे थे, वे सिर्फ उन संगठनों पर लगे थे, उनसे जुड़े लोगों पर नहीं। जबकि संगठनों को लोग ही चलाते हैं, संगठनों का अलग से महत्व नहीं होता। उन आधी-अधूरी कार्रवाइयों का नतीजा यह हुआ कि सिमी और आईएम से जुड़े लोगों ने दूसरा संगठन खड़ा कर लिया। 

इस बार पीएफआई से जुड़े लोगों पर ठोस कार्रवाई हुई है और आगे भी होनी है। तमाम लोगों के बायोमीट्रिक्स, हिस्ट्री शीट और संपत्ति के ब्योरे पुलिस के पास हैं। यूएपीए की जिन धाराओं के तहत कार्रवाई हुई है, उनमें कम से कम चौदह साल की सजा होनी है। बहुतेरे लोगों की पूरी उम्र जेल की सलाखों के पीछे गुजर जाएगी। विडंबना यह है कि एक खतरनाक संगठन के खिलाफ सरकार द्वारा कदम उठाए जाने के बावजूद इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। 

विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कई नेताओं ने, जिनमें पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक नेता भी हैं, इस कार्रवाई की आलोचना की है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। पीएफआई के खिलाफ सख्त कदम उठाने के लिए गृह मंत्रालय, प्रवर्तन निर्देशालय यानी ईडी और एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) की भूमिका निश्चित तौर पर सराहनीय है। लेकिन इस मोर्चे पर अभी यह शुरुआत है, इसे अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझना चाहिए। 

पीएफआई के खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए तीन मोर्चे पर वार करना होगा। पहला यह कि इस संगठन से जुड़े लोगों की चल-अचल संपत्ति जब्त करनी होगी। दूसरा यह कि इनके सपोर्ट सिस्टम को ध्वस्त करना होगा। और तीसरा यह कि देश भर में फैले इसके स्लीपर सेल की शिनाख्त कर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। तभी जाकर आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बने इस संगठन को पूरी तरह ध्वस्त करने के बारे में आश्वस्त हुआ जा सकेगा।

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