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केंद्रीय बैंकों की दौड़ से बढ़ता जोखिम : वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव और मंदी की आशंकाएं

Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 04 Oct 2022 03:15 AM IST
सार

बढ़ती दरों के परिणामस्वरूप डॉलर के मूल्य में वृद्धि हुई है और दुनिया भर की सभी मुद्राओं के मूल्य में भारी गिरावट आई है। रुपये की गिरावट पर इसका साफ असर देखा जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 45 अरब डॉलर से अधिक रकम बाजार में डाली है, इसका विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 537 अरब डॉलर हो गया है।

अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था - फोटो : iStock
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विस्तार

कहा जाता है कि राजनीति में एक हफ्ते का समय बहुत लंबा होता है। यह बात वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है। वर्ष 1964 के स्टर्लिंग संकट के दौरान हेरोल्ड विल्सन की चुटकी ब्रिटेन और वैश्विक वित्तीय बाजारों में गूंज रही है। 1964 में स्टर्लिंग (पाउंड/केबल) की कीमत दो डॉलर और 80 सेंट थी। पिछले हफ्ते बादशाह डॉलर ने महाराजा के पाउंड को एक डॉलर और तीन सेंट तक कम कर दिया। नीति के लिए संदर्भ मायने रखते हैं, खासकर जब शासन आर्थिक विकास को पुनर्जीवित करने के लिए इतिहास पर निर्भर रहता है। 



एक समय ब्रिटेन धनी था। पर अब इसकी जीडीपी भारत से नीचे है और इसकी अर्थव्यवस्था अन्य देशों के निवेश प्रवाह पर निर्भर करती है, जिसे मार्क कार्नी ने 'अजनबियों की दया' कहा है। लिज ट्रस की सरकार ने उन्हीं नीतियों से शुरुआत की, जिसे ऋषि सुनक ने परीकथा अर्थशास्त्र बताया था, और आईएमएफ की फटकार, एस ऐंड पी की समीक्षा और बाजार में घबराहट को प्रेरित किया। इस उथल-पुथल ने तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हलचल पैदा कर दी है।


बॉन्ड के मूल्य में भारी गिरावट के बाद पेंशन फंड में मंदी ने बैंक ऑफ इंग्लैंड को 65 अरब पाउंड भुगतान करने के लिए मजबूर किया। बैंक ऑफ जापान ने भी जापानी येन की तेज गिरावट (प्रति डॉलर 145 येन) को रोकने के लिए दखल दिया। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने बाजारों को एकतरफा मूल्यह्रास पर दांव न खेलने की चेतावनी दी, क्योंकि युआन 7.4 प्रति डॉलर तक गिर गया। इस झटके का तात्कालिक कारण मुद्रास्फीति का बने रहना है- उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति यूरोप में दोहरे अंकों में है, अमेरिका में लगभग आठ प्रतिशत है और भारत में आठ महीने से अधिक समय से छह प्रतिशत से ऊपर है। 

भले ही केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए जूझ रहे हैं, पर अमीर देशों ने उपभोक्ताओं को ऊर्जा की उच्च कीमतों से बचाने के लिए 'रेवड़ी इकॉनमी' का विस्तार करते हुए 500 अरब डॉलर आवंटित किए हैं। पश्चिम में इतिहास के सबक को भुला दिया गया। अगस्त, 1975 में मिल्टन फ्रीडमैन की प्रसिद्ध पुस्तक देयर इज नो सच थिंग एज फ्री लंच प्रकाशित हुई थी। एक साल बाद 1976 में मार्गरेट थैचर ने चर्चित बयान दिया था कि समाजवादी सरकारें हमेशा दूसरों के पैसे पर चलती हैं। 

यह सबक जी-7 अर्थव्यवस्थाओं की परेशानी का सबब बन गया है। दिलचस्प है कि वर्ष 2022 में थैचर की कंजरवेटिव पार्टी की सरकार में ब्रिटेन को धन की कमी हो रही है। बढ़ती मुद्रास्फीति ने केंद्रीय बैंकों के बीच ब्याज दरों को बढ़ाने की दौड़ शुरू कर दी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के इस थीम सांग पर अन्य केंद्रीय बैंक कोरस गा रहे हैं। मार्च के बाद से केवल छह महीनों में, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को 0.25 से बढ़ाकर 3.25 प्रतिशत कर दिया है और इसका लक्ष्य 4.5 प्रतिशत को छूना है। 

वास्तव में, अमेरिका ने 2015 से 2018 के बीच के तीन वर्षों की तुलना में पिछले छह महीने में दरों में ज्यादा बढ़ोतरी की है। कटु सच्चाई है कि लगातार मुद्रास्फीति का कारण संरचनात्मक मुद्दों में निहित है- समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं बूढ़ी हो रही हैं और वैश्विक जीडीपी का एक तिहाई अब पश्चिमी देशों के बाहर उत्पादित होता है। यह सच है कि मुद्रास्फीति का मतलब बहुत ज्यादा पैसे से बहुत कम चीजें खरीदना है। हालांकि ज्यादा माल तैयार करने वाली नाइके जैसी कंपनियों के कारण आपूर्ति की कमी घटी है और कच्चे तेल के दाम भी नीचे हैं। 
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कार्यबल की उपलब्धता को बढ़ावा देने के लिए प्रवासन की जरूरत को राजनीतिक प्रतिरोध और अनिच्छा के कारण स्वीकार नहीं किया जा रहा है। इसके बजाय बहस इस पर है कि श्रम की लागत कैसे कम की जाए। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने दरों को बढ़ाकर मुद्रास्फीति कम करने का फार्मूला अपनाया है, जिससे मांग घटेगी और बेरोजगारी बढ़ेगी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व श्रम की बढ़ती लागत को खलनायक मानता है। जबकि मजदूरी की लागत श्रम की आपूर्ति पर निर्भर करती है-और पश्चिम श्रमबल की उपलब्धता में भारी कमी का सामना कर रहा है। 

मांग पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी और महंगाई कम करने के लिए बेरोजगारी बढ़ाने के अपने जोखिम हैं। अब इस बात का डर है कि जिस तरह से ब्रिटेन में वित्तीय स्थिरता के लिए प्रणालीगत झटका देखा गया, वह विकसित और कमजोर बाजारों के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है। वैश्विक वित्तीय बाजारों की परस्पर संबद्धता को देखते हुए एक देश में कोई भी दुर्घटना दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकती है। 

प्रणालीगत जोखिम से परे, अल्प अवधि में ब्याज दरों को बढ़ाने से वैश्विक व्यापार और विकास प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ता है। बढ़ती दरों के परिणामस्वरूप डॉलर के मूल्य में वृद्धि हुई है और दुनिया भर की सभी मुद्राओं के मूल्य में भारी गिरावट आई है। रुपये की गिरावट पर इसका साफ असर देखा जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 45 अरब डॉलर से अधिक रकम बाजार में डाली है, इसका विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 537 अरब डॉलर हो गया है और रुपया 79.94 से और नीचे गिरकर 82 रुपये प्रति डॉलर के आसपास मंडरा रहा है। 

इससे पैसे की लागत बढ़ रही है और छोटे व्यवसायों की जीवन क्षमता को भी खतरा है। इस हफ्ते रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 50 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.9 फीसदी पर पहुंचा दिया और विकास अनुमान को भी घटाकर सात फीसदी कर दिया है। बड़े बैंकों में पहले से ही प्रमुख उधार दरें 13 प्रतिशत से ऊपर हैं और बैंक के लंबे बयान से स्पष्ट है कि इन दरों में और वृद्धि करनी होगी। आमतौर पर पैसे की लागत बढ़ने पर विकास दर में कमी आती है। भारत बेहतर स्थिति में है, लेकिन यह आशावादी होने का जोखिम नहीं उठा सकता। 

इसे अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सापेक्षिक योग्यता को उजागर करने और अपने मैक्रो फंडामेंटल को फिर से तैयार करने की जरूरत है। बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रतिस्पर्धी दरों में बढ़ोतरी की स्थिति बनी रह सकती है। दुनिया एक संकट से दूसरे संकट की तरफ नहीं जा सकती। आगामी दिसंबर में भारत जी-20 की अध्यक्षता करेगा। प्रणालीगत झटके के जोखिम और उच्च दर की मंदी के निर्यात को इसके एजेंडे में जगह जरूर मिलनी चाहिए।

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