विश्व: क्वाड, ऑकस के भंवर में अशांत एशिया

Sudhindra Kulkarni सुधींद्र कुलकर्णी
Updated Tue, 28 Sep 2021 05:12 AM IST

सार

क्वाड हो या ऑकस, भारतीयों और अन्य एशियाई लोगों को इसकी चिंता होनी चाहिए कि कैसे हमारे समुद्र और महासागर युद्धपोतों और पनडुब्बियों के लिए तेजी से खेल का मैदान बन जाएंगे। क्वाड एशिया को एक नए शीतयुद्ध और महंगे हथियारों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना सकता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : pexels.com
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विस्तार

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगौर अगर आज जीवित होते, तो बहुत दुखी होते। एक कवि-दार्शनिक, जिन्होंने एशियाई एकता की अथक वकालत की, एशिया में फूट और संघर्ष तथा पश्चिमी शक्तियों द्वारा महाद्वीप को प्रतिद्वंद्विता में फंसाने के मौजूदा प्रयासों को देखकर पूरी तरह व्यथित हो गए होते। उन्होंने जितने एशियाई देशों का दौरा किया, उतना उनके समय के किसी अन्य नेता ने नहीं किया। 
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जब 1921 में उन्होंने विश्व भारती की स्थापना की, तो उनका मुख्य लक्ष्य भारत और अन्य एशियाई देशों को जोड़ने वाले सदियों पुराने सभ्यता, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक बंधनों को पुनर्जीवित करना था। वह अकेले भारतीय नहीं थे, जिनके पास यह दृष्टि थी। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने भी एशियाई एकजुटता का समर्थन किया। गुरुदेव के सपनों का 'एशियाई मस्तिष्क' आज खंडित है। जो देश कभी उपनिवेशवाद के शिकार थे, वे अलग हो गए हैं। 


दुनिया की 60 फीसदी आबादी का घर एशिया तेजी से अशांत होता जा रहा है और पश्चिमी शक्तियां प्रतिस्पर्धी समूह बनाने और संघर्ष की आग भड़काने की कोशिश कर रही हैं। दुखद है कि एशिया में आंतरिक झगड़े शांति को नुकसान पहुंचा रहे हैं और अपने लोगों की भलाई के उद्देश्य वाले पारस्परिक लाभकारी सहयोग के अवसरों को बंद कर रहे हैं। पश्चिम एशिया ने हाल के दिनों में कई युद्ध देखे हैं- ईरान-इराक युद्ध, इराक पर अमेरिका का हमला, सीरिया एवं यमन में चल रहे युद्ध। 

दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान को चार दशकों के बाहरी युद्धों और आंतरिक संघर्षों का सामना करना पड़ा। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद भी अफगानिस्तान को स्थिरता और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण हासिल करने में मदद करने के लिए भारत और अन्य क्षेत्रीय पड़ोसियों द्वारा कोई सहयोगात्मक प्रयास नहीं किया गया है। ऐसा मुख्य रूप से तालिबान की धार्मिक कट्टरता और भारत-पाकिस्तान की शत्रुता के कारण है। 

आजादी मिलने के 75 साल बाद भी भारत और पाकिस्तान अच्छे-पड़ोसी का संबंध स्थापित करने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारी निरंतर शत्रुता के कारण दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ), जिसका सदस्य अफगानिस्तान भी है, पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया है। अफसोस की बात है कि भारत ने काबुल में शांति और समावेशी सरकार को बढ़ावा देने के लिए चीन, रूस, ईरान और पाकिस्तान से संबद्ध एक क्षेत्रीय सहयोगी प्रयास से खुद को अलग करने का फैसला किया है, जबकि इस मुद्दे पर इन पांच देशों के बीच कोई मतभेद नहीं है कि तालिबान शासन को आतंकवादी संगठनों को अभयारण्य मुहैया नहीं करना चाहिए। इस मंच से जुड़ने के बजाय भारत अपनी अफगान नीति को अमेरिका के साथ जोड़ रहा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान में 'आतंकवाद-विरोधी हवाई अभियानों' को अंजाम देने के लिए 'उत्तर-पश्चिम भारत' में किसी स्थान पर कथित तौर पर सैन्य अड्डे बनाने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए सहमत होना भारत और इस क्षेत्र के देशों के लिए विनाशकारी होगा। भारत इस बात पर ठीक ही जोर देता रहा है कि तालिबान को भारत के खिलाफ अफगानी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। तो फिर, हम अपनी धरती से अमेरिका के अफगान-विरोधी अभियानों की अनुमति कैसे दे सकते हैं?

भारत और चीन, दो महान पड़ोसी एशियाई सभ्यताएं संघर्षों में उलझी हुई हैं। अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो इन दोनों देशों के साथ-साथ महाद्वीप और दुनिया भर के लिए यह विनाशकारी होगा। भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर में अपने पड़ोसियों के साथ समुद्री विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने में चीन की विफलता ने अमेरिका को फायदा उठाने का मौका दिया है। 

अमेरिका का एशियाई विवाद में कूदने का कोई मतलब नहीं है, फिर भी वह हिंद-प्रशांत की बनावटी अवधारणा का आह्वान करता है, जो भारत के पाश्चात्य-प्रेमी सत्ताधारी अभिजात वर्ग को वैश्विक नेतृत्व पाने की भावना देता है। वाशिंगटन ने मोदी सरकार से भारत-चीन विवाद में दखल देने की हरी झंडी ले ली है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिकी शासक इस भरोसे के साथ काम करते हैं कि वे दुनिया के मालिक हैं और उन्हें कहीं भी अपनी ताकत दिखाने का अधिकार है। 

हालांकि हाल के दशकों में चीन के उदय के बाद अमेरिकी वैश्विक प्रभुत्व के दिन गिनती के रह गए हैं। इससे चिंतित होकर वह एशिया में फूट डालने का काम कर रहा है। इसी मकसद से चीन को काबू में करने के लिए वह सैन्य समूह बना रहा है। दुर्भाग्य से, हम भारतीयों ने चीन के साथ अपने विवादों को समानता और निष्पक्षता के आधार पर सुलझाने के बजाय अमेरिका के नेतृत्व वाले क्वाड में शामिल होने का विकल्प चुना। 

यह अनिवार्य रूप से एक चीन-विरोधी गठबंधन है, जो एशिया को एक नए शीतयुद्ध और महंगे हथियारों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना सकता है। क्या भारत को चीन पर गोली चलाने के लिए अपने कंधों का इस्तेमाल करने की अनुमति देनी चाहिए? और अमेरिकी खेल में भारत के मोहरा बनने का नतीजा क्या होगा? अमेरिका ने एक और चीन-विरोधी समूह ऑकस गठित की है, जो ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच एक सुरक्षा समझौता है। 

चीन को रोकने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां विकसित और तैनात करने में मदद करेंगे। पश्चिमी देश महंगे हथियार बेचकर ही समृद्ध होते हैं। क्वाड हो या ऑकस, भारतीयों और अन्य एशियाई लोगों को इसकी चिंता होनी चाहिए कि कैसे हमारे समुद्र और महासागर युद्धपोतों और पनडुब्बियों के लिए तेजी से एक खेल का मैदान बन जाएंगे। 

ठीक सौ साल पहले, महात्मा गांधी ने एक ऐसे भविष्य के बारे में चेतावनी दी थी, जब शक्तिशाली राष्ट्र, अपनी नौसेनाओं का उपयोग करते हुए, 'दुनिया की शांति के लिए खतरा पैदा करेंगे और इसके संसाधनों का दोहन करेंगे (यंग इंडिया, आठ दिसंबर, 1921)।' उनकी चेतावनी अब भयावह रूप से सच हो रही है। टैगोर ने भी एशियाई लोगों को यूरोपीय प्रतिद्वंद्विता की राक्षसी लक्षणों की नकल करने के खिलाफ चेतावनी दी थी। 'विश्व गुरु' बनने की इच्छा रखने वाला भारत गुरुदेव की चेतावनी को भी नजरंदाज कर रहा है। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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