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Delhi High Court : समलैंगिक विवाह को मान्यता संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई 24 अप्रैल को, हाईकोर्ट ने मांगा था पक्ष

अमर उजाला ब्यूरो, दिल्ली Published by: अनुराग सक्सेना Updated Tue, 06 Dec 2022 07:41 PM IST
सार

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने पीठ से इस मामले में तारीख देने का आग्रह किया, क्योंकि इसी तरह का एक मामला शीर्ष अदालत के समक्ष छह जनवरी को सुनवाई के लिए आ रहा है।

दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने विभिन्न कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 24 अप्रैल, 2023 तय की है। मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ को पक्षकारों द्वारा सूचित किया गया कि इसी तरह का एक मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है।



याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने पीठ से इस मामले में तारीख देने का आग्रह किया, क्योंकि इसी तरह का एक मामला शीर्ष अदालत के समक्ष छह जनवरी को सुनवाई के लिए आ रहा है।


केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट को इसी तरह की राहत की मांग करने वाली शीर्ष अदालत में लंबित याचिकाओं के बारे में भी बताया। 25 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों की अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था जिसमें शादी के अपने अधिकार को लागू करने और विशेष विवाह अधिनियम के तहत अपनी शादी को पंजीकृत करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी।

विशेष विवाह अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम और विदेशी विवाह अधिनियम के तहत अपने विवाह को मान्यता देने की घोषणा की मांग करने वाले कई समलैंगिक जोड़ों की आठ याचिकाएं उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हैं। याचिकाकर्ता अभिजीत अय्यर मित्रा और अन्य ने तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सहमति से समलैंगिक कृत्यों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के बावजूद समलैंगिक जोड़ों के बीच विवाह संभव नहीं है और इसलिए, उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम के तहत ऐसे विवाहों को मान्यता देने के लिए एक घोषणा की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6 सितंबर 2018 को दिए गए एक सर्वसम्मत निर्णय में ब्रिटिश युग के दंड कानून के एक हिस्से को खत्म करते हुए वयस्क समलैंगिकों या विषमलैंगिकों के बीच निजी स्थान पर सहमति से यौन संबंध को अपराध नहीं माना। इसे इस आधार पर अपराध घोषित किया कि यह समानता और सम्मान के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा था पक्ष
उच्च न्यायालय ने नवंबर 2020 में अय्यर की याचिका पर केंद्र का पक्ष मांगा था। केंद्र ने समलैंगिक विवाह का विरोध करते हुए कहा था कि भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है बल्कि एक जैविक पुरुष और महिला के बीच एक संस्था है। विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करने की इच्छा रखने वाली दो महिलाओं द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष दायर एक अन्य याचिका में कानून के प्रावधानों को उस हद तक चुनौती दी गई है, जहां तक यह समान सेक्स विवाहों के लिए प्रदान नहीं करता है।

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