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मिलिए 93 साल के उस शिल्पकार से, जिसने देश और दुनिया के लोगों को दिखाया है 'गांधी के घर का रास्ता'

देव प्रकाश चौधरी Updated Mon, 01 Oct 2018 06:49 PM IST
राम वी सुतार
राम वी सुतार
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नोएडा स्थित अपने विशाल स्टूडियो में राम वी. सुतार जैसे ही एक ओर अपना आसन ग्रहण करते हैं, वे जद्दोजहद का प्रतीक दिखाई देते हैं। कला के कई वादों से कई दशकों तक उनकी लड़ाई लगभग एकाकी ही रही, लेकिन 93 वर्ष का यह मूर्तिशिल्पकार आकार की दुनिया में अपनी विशालतम मौजूदगी को बनाए रखने के लिए आज भी कटिबद्ध दिखता है। कभी गांधी के जरिए तो कभी अंबेडकर के साथ। कभी सरदार पटेल के माध्यम से तो कभी दीन दयाल उपाध्याय के साथ। ढेर सारे महापुरुष, ढेर सारे पौराणिक पात्र, अनगिनत इतिहास पुरुष और दर्जनों विज्ञान पुरुष...लेकिन आकारों को रचने, ढालने और उन्हें स्थापित करने की इस यात्रा को, इतिहास के जिस नायक ने विश्वयात्रा बनाने में सबसे ज्यादा मदद की, वह गांधी ही थे और आज भी हैं। हंसते हुए कहते हैं, "आज भी गांधी मेरे लिए एक सपने की तरह हैं।" उनसे मिलना लगभग एक सदी से मिलने जैसा है।
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1925 में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव गोंडूर में पैदा हुए राम वी. सुतार ने स्कूल के दिनों में ही पहली बार जिस गांधी को बनाया था, वह हंसते हुए गांधी थे। पुरानी बात जब खुलती है तो उनके चेहरे पर एक आत्मविश्वास उतर आता है-"मेरे पास गांधी की एक तस्वीर थी। उसमें वे हंस रहे थे। मेरे एक टीचर को गांधी का बस्ट चाहिए था। मैंने बनाया। फिर उस बस्ट की एक और कॉपी भी बनाई। उस समय मुझे 300 रुपये मिले थे।" स्कूल के बाद जब वे मुंबई के 'जे.जे.स्कूल ऑफ आर्ट' में मूर्तिशिल्प के छात्र हुए तो उनकी कला की दुनिया बड़ी होती गई। उनकी कला का आकार भी बड़ा होता गया। कुछ छोटे-बड़े काम और एलोरा में पुरातत्व विभाग की नौकरी के बाद लगभग 1959 में सुतारजी दिल्ली आए तो गांधी को देखने, समझने और महसूस करने के कई दरवाजे खुले- "दुनिया के किसी भी हिस्से में सत्य और अहिंसा का जिक्र महात्मा गांधी को याद किए बिना पूरा नहीं होता। मुझे गांधीजी के अहिंसा मंत्र ने बहुत प्रभावित किया। गांधी जी के दर्शन में हर समस्या का आसान उपाय है। वह बेहद प्रैक्टिकल हैं। उनके दर्शन की जो भाषा है, उसे समझना आसान है।"
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