Thalaivii Review: कंगना की कमाल की अदाकारी में लेखन का रोड़ा, हिंदी संस्करण की ये हैं कमजोर कड़ियां

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 08 Sep 2021 03:51 PM IST

सार

‘थलाइवी’ या कहें कि जे जयललिता की कहानी मोटे तौर पर तमाम दर्शकों को पहले से पता है। पहले से जगजाहिर कहानियों को परदे पर देखने का आनंद तभी आता है जब उसमें ऐसी बातें खोजकर लाई गईं हो जो सार्वजनिक रूप से पहले से उपलब्ध नहीं।
थलाइवी रिव्यू
थलाइवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
थलाइवी
कलाकार
कंगना रणौत , अरविंद स्वामी , भाग्यश्री और जिशू सेनगुप्ता
लेखक
के वी विजयेंद्र प्रसाद और रजत अरोड़ा
निर्देशक
ए एल विजय
निर्माता
शैलेश आर सिंह
रेटिंग
2.5/5

विस्तार

जीवनी और प्रशस्ति गान में अंतर होता है। भारतीय सिनेमा में इन दिनों खूब बन रही बायोपिक भी बायोग्राफी कम और हैगीओग्राफी ज्यादा लगती हैं। ये फिल्में एक सधी हुई दिशा में आगे बढ़ती हैं। अपने निर्धारित लक्ष्य की तरफ। एकता कपूर ने क्रिकेटर अजहरुद्दीन के दामन पर लगे दागों को फिल्म ‘अजहर’ के जरिए मिटाने की कोशिश की थी। कंगना रणौत की फिल्म ‘थलाइवी’ में भी दक्षिण भारत की कद्दावर नेता जयललिता के जीवन के तमाम प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं। बाहुबली सीरीज की फिल्मों से हिंदी प्रदेशों में चर्चा पाने वाले पटकथा लेखक के वी विजयेंद्र प्रसाद ने फिल्म ‘थलाइवी’ की पटकथा लिखी है। फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के बाद कंगना की उनके साथ ये दूसरी फिल्म है। अभिनय के लिहाज से कंगना ने वाकई फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने लायक काम किया है, लेकिन फिल्म देखने के बाद एक दर्शक के मन में थोड़ी कसक रह ही जाती है। और, वह ये कि ये फिल्म जे जयललिता के जीवन के तमाम चर्चित पहलुओं को नजरअंदाज कर जाती है। जी स्टूडियोज ने फिल्म की सिनेमाघरों में रिलीज का प्रचार प्रसार भी हिंदी पट्टी में खास किया नहीं है। शायद इसलिए कि फिल्म को वैसे भी दो हफ्ते बाद ओटीटी पर रिलीज हो जाना है।
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थलाइवी
थलाइवी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘थलाइवी’ इसके पटकथा लेखक के वी विजयेंद्र प्रसाद के सेट पैटर्न पर ही शुरू होती है। उनकी पटकथाओं की शुरुआत बिल्कुल जेम्स बॉन्ड की फिल्मों की तरह होती है। आरंभ ही वह इतना चौंकाने वाला करते हैं कि दर्शक उनके बिछाए दृष्टिजाल में फंसे बिना रह नहीं पाता। लेकिन, जैसा कि उनकी पटकथा ने ‘बजरंगी भाईजान’ में किया था, वैसा ही लेखन उनका फिल्म ‘थलाइवी’ में इसके बाद है। फिल्म की कहानी धमाकेदार ओपनिंग के बाद एकदम से सुस्त पड़ जाती है। विश्व सिनेमा का इन दिनों यही पैटर्न है लेकिन हिंदी पट्टी के दर्शक इस पैटर्न से थोड़ा अलग फिल्में पसंद करते हैं। उनके लिए ड्रामा लगातार उबलते रहने वाला एहसास है।

‘थलाइवी’ या कहें कि जे जयललिता की कहानी मोटे तौर पर तमाम दर्शकों को पहले से पता है। पहले से जगजाहिर कहानियों को परदे पर देखने का आनंद तभी आता है जब उसमें ऐसी बातें खोजकर लाई गईं हो जो सार्वजनिक रूप से पहले से उपलब्ध नहीं। फिल्म ‘थलाइवी’ इस मामले में थोड़ा कमजोर पड़ती है। कहानी हालांकि फिल्म के दूसरे हिस्से में एकदम से रफ्तार पकड़ती है और क्लाइमेक्स के थोड़ा पहले तक दर्शकों को अपने साथ बहा भी ले जाती है। तारीफ यहां कंगना की इसलिए करनी होगी कि उन्होंने एक दक्षिण भारतीय चरित्र को उसकी पूरी भाषाई पहचान के साथ जिया है। जाहिर है कि फिल्म का अगर तमिल संस्करण हिंदी या अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ देखा जाए तो उसका असर कुछ अलग ही होगा। यहां रजत अरोड़ा के हिंदी संवाद कथानक और अभिनय के साथ बेमेल नजर आते हैं।

 

थलाइवी
थलाइवी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक साधारण सी अभिनेत्री के असाधारण हौसले और हिम्मत की कहानी कहती फिल्म ‘थलाइवी’ की अंतर्धारा भी ठीक से विकसित नहीं हो पाई है। तमिल सिनेमा की सबसे सफल जोड़ी एमजीआर और जयललिता के रिश्तों पर फोकस रखती फिल्म उस दौर के तमाम दूसरे किरदारों के साथ न्याय नहीं करती है। करुणानिधि वाला अध्याय भी फिल्म में सही से पेश नहीं किया गया। हां, एमजीआर के करीबी लोगों का जयललिता को लेकर रहा रवैया जरूर फिल्म में अपना असर छोड़ जाता है। निर्देशक ए एल विजय इस लिहाज से फिल्म में अपना काम बखूबी कर जाते हैं कि उन्होंने एक महिला की गौरव गाथा को करीने से परदे पर पेश कर दिया। उन्होंने जिस उद्देश्य से फिल्म बनाई, उसमें वह सफल हैं। दर्शक जिस उद्देश्य से फिल्म देखने पहुंचे, उनको भारतीय राजनीति की एक बहुचर्चित गाथा के सारे किस्से देखने को नहीं मिले।

थलाइवी
थलाइवी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनय के लिहाज से फिल्म ‘थलाइवी’ कंगना रणौत के करियर में एक और मील का पत्थर है। अपने करियर में इतनी मेहनत शायद ही किसी दूसरी फिल्म में उन्होंने की हो। एक लंबे कालावधि की कहानी कहती ऐसी कहानी में काया परिवर्तन की चुनौती भी उन्होंने बखूबी उठाई है। प्रोस्थेटिक मेकअप के बावजूद वह अपनी भाव भंगिमाएं दृश्यों की जरूरत के हिसाब से उभारने में सफल रही हैं। फिल्म में अरविंद स्वामी ने भी काबिले तारीफ काम किया है। एम जी रामचंद्रन के किरदार को जैसे उन्होंने आत्मसात कर लिया हो। और, ऐसा ही एक किरदार नासर ने भी किया है करुणानिधि का चोला ओढ़कर। हालांकि उनके किरदार की अवधि काफी कम है लेकिन जितने देर वह परदे पर दिखते हैं असर छोड़ने में कामयाब रहते हैं। मधु के हिस्से खास कुछ आया नहीं है। और, ऐसा इसलिए कि एमजीआर की पत्नी और जयललिता के रिश्तों पर ज्यादा ध्यान निर्देशक और पटकथा लेखक ने दिया नहीं। एक और कलाकार जो फिल्म ‘थलाइवी’ में अपनी तरफ दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहे, वह हैं राज अर्जुन।

थलाइवी
थलाइवी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तकनीकी तौर पर फिल्म ‘थलाइवी’ अपने समय के हिसाब से ही है लेकिन फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स में और मेहनत की गुंजाइश दिखती है। फिल्म चूंकि मूल रूप से तमिल में बनी है लिहाजा इसका बैकग्राउंड म्यूजिक भी उसी हिसाब से है। जी वी प्रकाश कुमार ने फिल्म के मूल संस्करण के प्रति वफादार रहते हुए ठीक काम किया है। फिल्म लड़खड़ाती है इसकी सिनेमैटोग्राफी और एडीटिंग के मामले में। फिल्म की मेकिंग के हिसाब से इसकी अवधि कम से कम 20 मिनट कम हो सकती थी। किसी खास कालखंड में बनी फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी भी हीरो से कम नहीं होती। लेकिन, फिल्म ‘थलाइवी’ के कई दृश्यों में 60 और 70 के दशकों का सेटअप बनावटी दिखता है।
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