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मध्यप्रदेश चुनाव: हर जगह नहीं चलता सोशल मीडिया का जादू, यहां लोकगीतों का बोलबाला

चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 09 Nov 2018 02:46 PM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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दौर मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए अपने वोटर तक पहुंचने का है। लेकिन जहां मोबाइल की ही पहुंच न हो, वहां क्या? ऐसे इलाकों में आज भी परंपरागत तरीकों का इस्तेमाल करके न सिर्फ वोटरों तक पहुंचा जाता है बल्कि उन्हें जागरुक करने का काम भी किया जाता है। मध्यप्रदेश के धार में प्रचार-प्रसार का काम लोकगीतों के जरिए हो रहा है। इन इलाको मे आज भी मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने के लिए परंपरागत लोकगीतों को रास्ता बनाया जाता है। आदिवासी मूल के कार्यकर्ता ऐसे गीतों के माध्यम से अपनी बातों को वहां की जनता के बीच रखते हैं।
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दरअसल, जिले के कई विधानसभा क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क दुरुस्त नही है। आदिवासियो की माली हालत भी मोबाइल खरीदने की इजाजत नहीं देती। यानी फेसबुक और व्हॉट्सएप जैसे माध्यम भी प्रचार से आउट हैं। ऐसी स्थिति में परंपरागत रूप से आदिवासी कार्यकर्ता चुनावी प्रचार प्रसार में लोकगीतों का सहारा ही लेते हैं।

लोकगीत बनाने वाले कलाकारों से लेकर उनको गाने वाले गायकों की मांग भी चुनाव के समय बढ़ जाती  है। भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक पार्टियां ऐसे  लोगो से पंरपरागत लोकगीत तैयार करवाते हैं। ये लोकगीत तय करते हैं कि उम्मीदवारों की बात वोटर तक पहुंचे और वोटर मतदाता केंद्र तक।
मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को मतदान होना है। नतीजे 11 दिसंबर को आएंगे। 

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