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Gujarat Election: क्या पाटन-मेहसाणा में फिर पलटेगी बाजी? भाजपा को खोई जमीन वापस पाने की उम्मीद

Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 29 Nov 2022 10:12 AM IST
सार

इस इलाके में पाटीदार, दलित और मुस्लिम समुदाय कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवारों और नेताओं के कोई प्रचार न कर पाने की स्थिति में भी वह इस इलाके में 30-35 फीसदी वोट पाने में सफल रहती है। इस वोट बैंक के आधार पर काम कर कोई भी राजनीतिक दल अपनी बड़ी सियासी जमीन तैयार कर सकता है, लेकिन यहां के लोगों के आरोप हैं कि कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रहती है।

मेहसाणा में बना आधुनिक बस स्टैंड जिसका पीएम मोदी ने किया था लोकार्पण।
मेहसाणा में बना आधुनिक बस स्टैंड जिसका पीएम मोदी ने किया था लोकार्पण। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले पाटीदार, ओबीसी और दलित समुदाय के आंदोलनों ने कांग्रेस के लिए बड़ी जमीन तैयार कर दी थी।इन आंदोलनों का गुजरात में सबसे ज्यादा प्रभाव पाटन और मेहसाणा के इलाके में ही देखा गया था। इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि इस इलाके में पाटीदार समुदाय की सबसे ज्यादा आबादी निवास करती है। आंदोलनों का यह असर हुआ कि पाटन की चार विधानसभा सीटों में से तीन पर कांग्रेस को जीत मिली तो भाजपा केवल एक पर सिमट कर रह गई। इसी तरह मेहसाणा में कांग्रस को सात तो भाजपा को केवल दो सीटों पर सफलता मिली। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदलती दिख रही है। 


हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी, इन आंदोलनों से निकले तीन बड़े चेहरों ने सियासत में हाथ आजमाना शुरू कर दिया है। इससे इनकी अपनी राजनीतिक हैसियत जरूर मजबूत हो रही है, लेकिन जिन आंदोलनों से ये नेता निकलकर आए, वह दम तोड़ चुका है। अब इस इलाके में इन समुदायों के आरक्षण को लेकर कोई हलचल नहीं है। लिहाजा पूरा चुनाव उम्मीदवारों और पार्टियों के अपने तंत्र के उपयोग पर आकर टिक गया है। ऐसे में बाजी किसी भी उम्मीदवार के हाथ लग सकती है। भाजपा समर्थकों का दावा है कि जनता ने इन आंदोलनों की असलियत समझ लिया है, इसलिए अब तस्वीर फिर भाजपा के पक्ष में पलट सकती है।

आंदोलनों के जरिए सरकारी नौकरियों में इन समाज के युवाओं के लिए आरक्षण का मुद्दा जबरदस्त तरीके से उठाया गया था। पाटीदार-ओबीसी समुदाय के युवा अपनी भागीदारी को लेकर बेहद सतर्क दिख रहे थे। लेकिन आज इस इलाके में बेरोजगारी चुनाव का कोई मुद्दा नहीं रह गया है। पाटन के रंजीत कहते हैं कि गुजरात दूसरे राज्यों से आए लाखों लोगों को नौकरी-रोजगार उपलब्ध कराता है, ऐसे में हमारे अपने लिए रोजगार न हो, ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन युवाओं की नाराजगी सरकारी नौकरी में आरक्षण को लेकर थी। लेकिन वे भी यह समझते हैं कि सरकारी नौकरी सबको नहीं दी जा सकती, स्वरोजगार ही आर्थिक समृद्धि का रास्ता खोल सकता है, लिहाजा अब आरक्षण की मांग कमजोर पड़ चुकी है।  

इस इलाके में पाटीदार, दलित और मुस्लिम समुदाय कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवारों और नेताओं के कोई प्रचार न कर पाने की स्थिति में भी वह इस इलाके में 30-35 फीसदी वोट पाने में सफल रहती है। इस वोट बैंक के आधार पर काम कर कोई भी राजनीतिक दल अपनी बड़ी सियासी जमीन तैयार कर सकता है, लेकिन यहां के लोगों के आरोप हैं कि कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रहती है। कांग्रेस की कमजोरी का लाभ भाजपा को मिल जाता है और वह आसानी से जीत हासिल करने में सफल हो जाती है। 

मेहसाणा के मेमन सलीम बताते हैं कि भाजपा ने इस इलाके में विकास के बहुत कार्य किए हैं। बड़ी-बड़ी सड़कें, मेडिकल कॉलेज और चौराहों पर यातायात की व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय स्तर के बस स्टैंड यहां के लोगों को आकर्षित करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं यहां कई योजनाओं के उद्घाटन समारोह में आ चुके हैं। इससे लोगों के बीच यह छवि बन गई है कि यदि इलाके का विकास करना है तो उन्हें नरेंद्र मोदी को लाना चाहिए। यही भाजपा की ताकत बन जाती है। 

यह लोकसभा का चुनाव नहीं है, लेकिन इसके बाद भी पाटन-मेहसाणा में पूरा चुनाव केवल नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है। स्थानीय सुनील पाटीदार बताते हैं कि ज्यादातर लोगों को उम्मीदवारों के नाम तक पता नहीं होते। कुछ लोगों को स्थानीय उम्मीदवारों से नाराजगी होती है तो भाजपा चेहरा बदलकर इस नाराजगी को शांत कर देती है। इस बार भी यहां भाजपा को सफलता मिल सकती है। 
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