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Bombay Highcourt: 100 साल पुरानी जर्जर इमारत को ढहाने की इजाजत, लोगों को भवन छोड़ने के निर्देश

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Amit Mandal Updated Tue, 16 Aug 2022 03:50 PM IST
सार

पांच मंजिला इमारत 100 साल से अधिक पुरानी है। इसका उपयोग विधवाओं को छात्रावास की सुविधा प्रदान करने के लिए किया जाता है।

Bombay High Court
Bombay High Court - फोटो : social media
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विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) को दक्षिण मुंबई में एक सदी पुरानी जर्जर इमारत को गिराने की मंजूरी दे दी है और इसके रहने वालों को परिसर खाली करने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट ने 11 अगस्त को पारित एक आदेश में कहा कि भवन 'एच एन पेटिट विडोज होम' एक व्यस्त सड़क पर स्थित है और कोई भी अप्रिय घटना होने पर इससे बड़ा नुकसान हो सकता है। न्यायमूर्ति आरडी धानुका और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने बीएमसी तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि इमारत जर्जर और खतरनाक स्थिति में है और इसलिए इसे गिराया जाना चाहिए।



बीएमसी ने अप्रैल में भवन खाली करने का दिया था निर्देश 
समिति की रिपोर्ट के आधार पर बीएमसी ने इस साल अप्रैल में भवन के मकान मालिक को परिसर खाली करने के लिए पत्र जारी किया था। इमारत के कुछ रहने वालों और इसके भूतल पर दुकानें चलाने वाले किरायेदारों ने हालांकि, परिसर को खाली करने से इनकार कर दिया और अदालत का रुख करेत हुए कहा कि भवन को केवल मामूली मरम्मत की जरूरत है। पांच मंजिला इमारत 100 साल से अधिक पुरानी है। इसका उपयोग विधवाओं को छात्रावास की सुविधा प्रदान करने के लिए किया जाता है। भवन की खराब स्थिति के कारण यहां रहने वाली विधवाओं को 2019 में दूसरे छात्रावास में स्थानांतरित कर दिया गया। अक्टूबर 2021 में बीएमसी ने संरचनात्मक ऑडिट बैठक की, जिसमें यह निष्कर्ष निकला कि इमारत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है और गिर सकती है। इससे न सिर्फ रहवासियों बल्कि राहगीरों की जान को भी खतरा है।


उन्होंने कहा कि इमारत को जल्द से जल्द गिराया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह एक स्वीकृत तथ्य है कि यह इमारत भुलेश्वर (दक्षिण मुंबई में) के बहुत भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित है और बहुत से लोग उस सड़क से गुजरते हैं। बेंच ने कहा कि अगर इस इमारत को बनाए रखने की अनुमति दी जाती है, तो कोई अप्रिय घटना होने पर न केवल इमारत में रहने वालों बल्कि राहगीरों की भी जान चली जाएगी। अदालत ने आगे कहा कि जिस भूखंड पर इमारत खड़ी है, वह भी प्रस्तावित मेट्रो रेल से सटा हुआ है। 

अदालत ने कहा, हम इस तथ्य पर भी ध्यान देते हैं कि इमारत के नीचे की भूमि का एक बड़ा हिस्सा नियमित लाइन के साथ-साथ मेट्रो से भी प्रभावित है। अगर इमारत को गिरा दिया जाता है और उसका पुनर्निर्माण नहीं किया जाता है, तो किरायेदारों के पास कानूनी विकल्प है। अदालत ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं के अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकती है, कि इससे भवन की मरम्मत के लिए भूतल पर रहने वाले किरायेदारों के हितों की रक्षा होगी, लेकिन इमारत के मकान मालिक और अन्य रहने वालों के अधिकारों की अनदेखी होगी।

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