नाराजगी: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- सरकार यदि ट्रिब्यूनल नहीं चाहती तो उपभोक्ता संरक्षण कानून रद्द कर दे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Fri, 22 Oct 2021 09:40 PM IST

सार

पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अमन लेखी से कहा कि इन न्यायाधिकरणों में पदों के भरे न होने से इन्हें गठित करने का उद्देश्य ही विफल हो जाता है। यदि सरकार इन ट्रिब्यूनलों को नहीं चाहती है तो उपभोक्ता संरक्षण कानून को समाप्त कर दें।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani
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विस्तार

विभिन्न न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) में भारी रिक्तियों से आहत सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अगर इस न्यायालय को ही ट्रिब्यूनल में नियुक्ति के लिए बाध्य किया जाता है तो बेहतर यह होगा कि केंद्र सरकार ट्रिब्यूनलों को खत्म कर दे। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने इस मामले में केंद्र के रुख पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट को न्यायाधिकरणों में रिक्तियों को भरने के लिए कहा जा रहा है जबकि यह सरकार का काम है।
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पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अमन लेखी से कहा कि इन न्यायाधिकरणों में पदों के भरे न होने से इन्हें गठित करने का उद्देश्य ही विफल हो जाता है। यदि सरकार इन ट्रिब्यूनलों को नहीं चाहती है तो उपभोक्ता संरक्षण कानून को समाप्त कर दें। हम नियुक्तियों को सुनिश्चित करने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं। उन्हें नियमित प्रक्रिया से भरा जाना चाहिए लेकिन ऐसी स्थिति है कि इस अदालत को कदम उठाना होगा। 


पीठ ने आगे कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायपालिका को ऐसा करने के लिए कहा गया है। जब आपके पास कानून, फोरम और नियम है तो उन्हें स्वाभाविक रूप से भरना चाहिए। यह बहुत खुशी की स्थिति नहीं है। इस प्रक्रिया में कानून की मंशा ही खत्म हो जाती है। सुनवाई के दौरान न्याय मित्र वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ का ध्यान आकर्षित किया कि केंद्र सरकार, मद्रास बार एसोसिएशन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन करते हुए जुलाई 2021 में ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम लेकर आई है। 

पीठ ने कहा कि देश भर में उपभोक्ता अदालतों में लगभग 800 रिक्तियों को भरने के लिए आठ सप्ताह की समयसीमा तय करने के अगस्त के आदेश का भी केंद्र और राज्यों को सख्ती से पालन करना होगा। मामले में अगली सुनवाई 10 नवंबर को होगी।

हम कुछ कहते हैं आप कुछ करते हैं
अमन लेखी ने कोर्ट से कहा कि केंद्र सरकार बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील दायर करने की प्रक्रिया में है जिसके तहत उपभोक्ता संरक्षण कानून के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया गया है। इस पर पीठ ने लेखी से कहा कि न्यायपालिका कुछ कहती है। आप कुछ और करते हैं। इसके कारण एक असमंजस की स्थिति बन गई है जिसका खामियाजा नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। ये आम आदमी की परेशानियों को दूर करने के फोरम हैं। उदाहरण के लिए उपभोक्ता अदालतों को लें, वहां के विवाद बहुत अधिक बड़े नहीं हैं लेकिन आपने उन्हें समाधानहीन कर दिया है। लेखी ने जवाब दिया कि सरकार, उपभोक्ता अदालत के मामलों में अहंकार की वजह से कोई देरी नहीं कर रही है। इस पर पीठ ने कहा कि जो भी हो हम ऐसी स्थिति से खुश नहीं हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला महाराष्ट्र को छोड़ बाकी जगह लागू नहीं
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र को छोड़ बाकी सभी राज्यों के लिए उपभोक्ता अदालतों में सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया अगस्त के आदेश के अनुसार होगी। महाराष्ट्र को छोड़ बाकी राज्य बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे जिसमें राज्य व जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्तियों से संबंधित उपभोक्ता संरक्षण नियम, 2020 के कुछ प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया था।

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