Punjab assembly election 2022: चन्नी को सीएम बनाने के राहुल गांधी के दांव से बेचैन मायावती, क्या राज्य में एससी वोट फिसलने का खतरा बढ़ा

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Mon, 20 Sep 2021 02:42 PM IST

सार

चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का सीएम बनाने से बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को एससी वोट खिसकने का डर सताने लगा है। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि अकाली दल के साथ गठबंधन करके मायावती पंजाब की राजनीति में भी अपनी अहमियत साबित करना चाहती थी लेकिन कांग्रेस ने एससी सीएम बनाकर उनकी रणनीति को करारा झटका दिया है। 
 
चरणजीत सिंह चन्नी (कैबिनेट मंत्री)
चरणजीत सिंह चन्नी (कैबिनेट मंत्री) - फोटो : Social Media
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विस्तार

चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाए जाने पर सबसे ज्यादा खलबली बहुजन समाज पार्टी में मच गई है। चन्नी को सीएम बनाए जाने पर मायावती ने कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा यह केवल कांग्रेस का चुनावी हथकंडा है। उन्होंने दलित मतदताओं से अपील की है कि वे कांग्रेस की ओर न जाएं। मायावती की यह अपील आगामी विधानसभा चुनाव में राज्य में अपने पैर जमाने के मद्देनजर है, क्योंकि इस चुनाव के जरिए वे पंजाब की राजनीति में बसपा का कद बढ़ाने की कवायद में लगी हैं। 
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दरअसल दलितों का वोट बैंक पंजाब में बंटा हुआ है। कौन सा वर्ग किस पार्टी की तरफ झुकता है, राजनीतिक समीकरण उसी पर निर्भर करता है। 2017 की तरह ही 2022 के विधानसभा चुनाव में भी एससी मतदाता एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले हैं। इस वजह से एससी की भूमिका को देखते हुए राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने स्तर पर उन्हें लुभाने की कवायद शुरू कर दी है। हालांकि कांग्रेस ने सन्नी को सीएम बनाकर जो नई बिसात बिछा दी है उसके बाद इन पार्टियों में बेचैनी बढ़ गई है, खासकर मायावती में। इसलिए मायावती को कहना पड़ा कि कांग्रेस पार्टी बसपा और अकाली दल के गठबंधन से घबरा गई है। 




बसपा क्यों बेचैन
पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल  और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के बीच इसी साल जून में चुनावी गठबंधन हुआ है। दोनों पार्टियां मिलकर पंजाब में चुनाव लडेंगी। 117 सीटों में से बसपा 20 सीटों पर जबकि अकाली दल शेष 97 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। 25 साल पहले प्रकाश सिंह बादल ने कांसीराम के साथ मिलकर गठबंधन किया था और दोनों पार्टियां 1996 में मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ी थीं। गठबंधन को 13 में से 11 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

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हालांकि 1997 के विधानसभा चुनाव तक आते आते यह गठबंधन बिखर गया है और पिछले साल  सितंबर में अकाली दल ने भारतीय जनता पार्टी के साथ दोस्ती कर ली। लेकिन पिछला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ने वाला अकाली दल इस बार तीन कृषि कानूनों को लेकर भाजपा से गठबंधन तोड़ चुका है और एनडीए से अलग हो चुका है। इस बार अकाली दल मायावती का चेहरा आगे करके इस दलित वोट बैंक को हासिल कर एक बार फिर से सत्ता में आने की कोशिशों में जुटा है। माना यह जा रहा था कि कुछ सर्वे में यह बात सामने आई कि अकाली-बसपा गठबंधन की तरफ एससी का रुझान बढ़ रहा था।
 
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