साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नन्दकिशोर आचार्य बोले, विचारों के संघर्ष में हिंसक विचार की जीत

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 18 Dec 2019 08:27 PM IST
Nand Kishore Acharya
Nand Kishore Acharya - फोटो : Social Media
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साहित्य अकादमी पुरस्कार 2019 की घोषणा हो चुकी है। हिंदी के प्रख्यात कवि नन्दकिशोर आचार्य को उनके कविता संग्रह 'छीलते हुए अपने को' के लिए इस सम्मान को देने की घोषणा हुई है। इस अवसर पर हमारे विशेष संवाददाता अमित शर्मा ने उनसे टेलीफोन पर बातचीत की और देश, समाज और साहित्य की वर्तमान परिस्थितियों पर लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है वार्ता के प्रमुख अंश-
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आपको पुरस्कार के लिए आपको चुने जाने पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
नन्दकिशोर आचार्य- बहुत-बहुत धन्यवाद। अमर उजाला परिवार और उसके पाठकों को भी बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रश्न- आचार्य जी, देश के मौजूदा वातावरण पर आपकी राय क्या है?

उत्तर- मेरे लिए यह बेहद तकलीफदेह बात है कि समाज में कई तरह की हिंसा बढ़ रही है। मैं जब हिंसा की बात करता हूं, तो मैं केवल लोगों के बीच मारपीट वाली हिंसा की बात नहीं कर रहा होता हूं। वह तो हिंसा का केवल स्थूल रुप है। मेरे लिए हिंसा का अर्थ सांस्कृतिक हिंसा, वैचारिक हिंसा और प्रकृति के प्रति हिंसा जैसी सभी हिंसाओं से है। दुर्भाग्य यह है कि केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में एक विशेष अर्थ में हिंसा की स्वीकार्यता बढ़ी है।


लोग हिंसा को स्वीकृति देते नजर आ रहे हैं। हिंसक घटनाओं की निंदा की बजाय उनका जयगान होते हुए देखा जा रहा है। चाहे वह राज्य की तरफ से की गई हिंसा ही क्यों न हो, इसकी स्वीकार्यता कभी नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न-  हिंसा का नकारात्मक असर जगजाहिर है। आप इसके असर को किस प्रकार देखते हैं?

उत्तर- वैचारिक हिंसा को मिल रही स्वीकृति से स्थूल हिंसा को भी स्वीकृति मिलने लगती है, या कहूं तो मिल रही है। ऐसे में जब दो विचारों का टकराव होता है, तो इसमें जीत उस विचार की होती है, जो ज्यादा हिंसक वर्ग के पक्ष से आता है। इसका दुष्प्रभाव होता है कि विचार हार जाता है। इससे वैचारिक पक्ष को मजबूत करने की बजाय स्थूल हिंसा को मजबूत करने की प्रवृत्ति विकसित होती है। सांस्कृतिक और वैचारिक रुप से मिली हिंसा बाहर की हिंसा को औचित्य प्रदान करती है। इसलिए हर हाल में इसे रोका जाना चाहिए।

मौजूदा समय में राष्ट्रों के बीच हथियारों की होड़ इस बात को प्रमाणित करती है कि लोग वैचारिक रुप से समृद्ध होने से ज्यादा हथियारों के तौर पर मजबूत होते दिखना चाहते हैं। दुनिया के विकास की दृष्टि से यह विचार बेहद घातक है। इसकी कीमत अंततः इंसानियत को चुकानी पड़ती है।

प्रश्न-  आपको इस हिंसा से बचने का क्या उपाय दिखाई पड़ता है?

उत्तर- महात्मा गांधी ने 1931 में कहा था कि देश की आजादी से ज्यादा जरूरी है कि इंसानों को बर्बर होने से बचाया जाए। उनका मानना था कि अगर इंसान बर्बर रहेगा, तो आजादी मिलने के बाद भी एक वर्ग दूसरे के ऊपर ज्यादती करने की कोशिश करेगा। इससे अंततः हिंसा को ही बढ़ावा मिलेगी। मेरा मानना है कि साहित्य ही समाज को हिंसा से बचा सकता है। इसलिए अलग-अलग आयामों से साहित्य को लोगों तक पहुंचाना होगा। लोगों को इससे जोड़ना होगा। समाज को हिंसक होने से बचाने का यही रास्ता सबसे ज्यादा कारगर हो सकता है।

प्रश्न-  आप साहित्य से समाज को हिंसक होने से बचाने की बात कर रहे हैं। लेकिन देखा जा रहा है कि समाज और विशेषकर युवा, साहित्य से दूर हो रहा है। ऐसे में रास्ता क्या है?

उत्तर- साहित्य एक अर्थ में सिनेमा जैसे विकल्पों में अपनी जगह तलाश रहा है। लेकिन समस्या यह है कि कॉमर्शियल सिनेमा कलात्मक सिनेमा पर भारी पड़ रहा है। अगर कलात्मक सिनेमा के जरिए संवेदनशील विषयों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाए, तो इससे बेहतर और क्या होगा? जहां तक युवाओं को साहित्य से जोड़ने की बात है, मैं कहूंगा कि साहित्य बड़ी गंभीरता का विषय है। यह शोर की बजाय एकांत तलाशता है। सक्रिय साहित्य से हमेशा समाज का एक विशेष वर्ग ही जुड़ता है। हां, इसके विभिन्न आयामों से अलग-अलग माध्यमों से लोग इससे अवश्य जुड़ते हैं जो आज भी चल रहा है। ऐसे में यह बहुत चिंता का विषय नहीं है।

प्रश्न-  इंटरनेट और मोबाइल ने बच्चों को बाल साहित्य से दूर किया है। ऐसे में साहित्य के भविष्य पर आप क्या कहेंगे?

उत्तर- निश्चित रूप से बच्चों का बाल साहित्य से दूर होना चिंता का विषय है। लेकिन इसमें भी बाजार भारी पड़ रहा है। यह राष्ट्र और समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपने भविष्य को बेहतरीन शिक्षा से जोड़े। जब तक यह राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा नहीं बनेगा तब तक राह मिलनी मुश्किल है।

प्रश्न-  और अंत में, हिंदी के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?

उत्तर- देखिये, हिंदी के भविष्य को लेकर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। सच्चाई यह है कि हिंदी लगातार मजबूत हुई है। इसमें लोगों को, समाज को जोड़ने की ताकत है और जब तक उसमें यह ताकत है किसी को हिंदी की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं के कुछ शब्द हिंदी में अपनी जगह तलाश रहे हैं। अगर लोग इन्हें स्वीकार करते हैं, तो यह इसका एक हिस्सा बन जाएगा और अगर समाज इन्हें स्वीकार नहीं करेगा, तो ये स्वयं प्रचलन से बाहर हो जाएंगे। ऐसे में यह चिंता का बड़ा कारण नहीं है।
      

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