अमर उजाला विश्लेषण: 'वोट कटवा' नहीं बनेंगी प्रियंका गांधी, अगर हार मिली तो चुनाव न लड़ने वालों से ज्यादा बड़ा होगा कद!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 23 Nov 2021 06:33 PM IST

सार

प्रियंका गांधी ने अपने प्रमुख चुनावी एजेंडे में महिलाओं पर खास फोकस किया है। उत्तर प्रदेश में पांच करोड़ से ज्यादा महिला वोटर हैं। साल 2017 में 40,905,867 महिलाओं ने वोट दिया था। प्रियंका, अब इन्हीं महिलाओं पर ध्यान दे रही हैं। 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' इन शब्दों के जरिए प्रियंका गांधी को उम्मीद है कि इस बार महिला वोटरों का उन्हें समर्थन मिल सकता है...
प्रियंका गांधी वाड्रा
प्रियंका गांधी वाड्रा - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)
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विस्तार

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी राह खुद चुनी है। चुनाव कैसे लड़ना है, कौन से मुद्दे आगे रहेंगे और लोग अपने परिवार के बीच में 'कांग्रेस' की बात करें, इसके लिए सारी रणनीति, प्रियंका स्वयं तैयार कर रही हैं। जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश का चुनाव निकट आ रहा है, प्रियंका गांधी पर चुनाव लड़ने का दबाव बढ़ने लगा है। प्रदेश में ऐसे बहुत से नेता और कार्यकर्ता हैं, जिनकी सक्रियता प्रियंका के चुनाव में कूदने पर टिकी है। अगर प्रियंका गांधी, चुनाव लड़ने का एलान कर देती हैं तो पार्टी नेताओं के पास मजबूत आधार न होते हुए भी वे पूरे जोश के साथ चुनाव में उतर जाएंगे। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, प्रियंका गांधी का चुनाव में उतरना बहुत जरूरी है। अगर इसके बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अगर प्रियंका को हार मिली तो 'इंदिरा की पोती' का कद चुनाव न लड़ने वालों से कहीं ज्यादा बड़ा हो जाएगा।
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क्या प्रियंका गांधी खुद चुनाव लड़ेंगी?

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव, कांग्रेस पार्टी के लिए आसान नहीं है। साल 2017 में कांग्रेस पार्टी को यहां पर 403 विधानसभा सीटों में से केवल सात सीटों पर संतोष करना पड़ा था। प्रियंका गांधी ने पार्टी की इस स्थिति के बावजूद उत्तर प्रदेश में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। वे पार्टी की महासचिव होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की प्रभारी भी हैं, ऐसे में चुनावी रणनीति तय करने की जिम्मेदारी भी खुद ही उठा रही हैं। प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश चुनाव में बहु आयामी रास्ता चुना है। वजह, उनके सामने जो दल हैं, उनकी चाल अलग है। कोई दल, धर्म को अहम मानकर चुनाव में आगे बढ़ रहा है तो दूसरी पार्टी जाति को ही अपना आधार मान रही है। कहीं पर मंदिर है तो कहीं मस्जिद है। राजनीतिक जानकारों का कहना है, ऐसे चुनावी रण में प्रियंका ने अपने लिए जो राह चुनी है, वह सटीक है। प्रियंका गांधी, मंदिर में पूजा अर्चना कर या गंगा में डुबकी लगाकर उस पार्टी को जवाब देती हैं जो ऐसे मुद्दों को अपना प्रमुख आधार मानती हैं। अब कांग्रेस पार्टी को लगता है कि उत्तर प्रदेश में प्रियंका चुनावी माहौल तो बना रही हैं, मगर अभी एक सवाल बाकी है। क्या प्रियंका गांधी खुद चुनाव लड़ेंगी।

कार्यकर्ताओं में पड़ता है नकारात्मक प्रभाव   

जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार ने बताया, चुनाव लड़ने वाली किसी कमजोर पार्टी के बड़े नेता के बचकर चलने पर, जनता और कार्यकर्ताओं में उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यहां किसी मेट्रो सिटी के चुनाव की बात नहीं हो रही, ये उत्तर प्रदेश का चुनाव है। जो बिना मुकाबले में हार का सामना करने की हिम्मत दिखाए, ऐसी पार्टी के प्रत्याशी 'वोट कटवा' की बदनामी के शिकार होकर हाशिए पर चले जाते हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश में बिना संकोच के चुनाव में उतरना ही प्रियंका गांधी का सही कदम होगा। अगर विधानसभा चुनाव में हार मिली तो भी प्रियंका का कद, चुनाव न लड़ने वालों से ज्यादा बड़ा हो जाएगा। अगर अब कांग्रेस पार्टी की महासचिव, चुनाव मैदान में नहीं उतरती हैं, तो यह कदम न केवल उनके लिए, बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी गर्त में ले जा सकता है।

महिला वोटरों का मिल सकता है समर्थन

प्रियंका गांधी ने अपने प्रमुख चुनावी एजेंडे में महिलाओं पर खास फोकस किया है। उत्तर प्रदेश में पांच करोड़ से ज्यादा महिला वोटर हैं। साल 2017 में 40,905,867 महिलाओं ने वोट दिया था। प्रियंका, अब इन्हीं महिलाओं पर ध्यान दे रही हैं। 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' इन शब्दों के जरिए प्रियंका गांधी को उम्मीद है कि इस बार महिला वोटरों का उन्हें समर्थन मिल सकता है। प्रियंका गांधी की सीतापुर में पीएसी गेस्ट हाउस में झाड़ू लगाने की तस्वीर खूब वायरल हुई थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उस तस्वीर बाबत कहा था कि लोगों ने उन्हें इसी लायक छोड़ा है। इसके जवाब में प्रियंका गांधी अचानक लखनऊ में लव कुश नगर स्थित दलित बस्ती में पहुंच गईं। प्रियंका ने वहां के वाल्मीकि मंदिर में झाड़ू लगाकर योगी के बयान पर न केवल पलटवार किया, बल्कि उनकी सरकार को भी एक संदेश दे डाला। प्रियंका गांधी ने कहा था, झाड़ू लगाना स्वाभिमान और सादगी का प्रतीक है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जातिवादी बयान देकर अपनी दलित विरोधी मानसिकता दिखाई। देश के करोड़ों दलितों और महिलाओं का अपमान भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। इस झाड़ू के माध्यम से प्रियंका 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' को आगे बढ़ाते हुए और दलितों के बीच खुद को ज्यादा मजबूती से खड़ा करने का प्रयास करती हुई नजर आईं।

परपंरागत राजनीति से अलग कर रही हैं वादे

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, प्रदेश में सपा व बसपा जाति को आधार बनाकर अपनी चुनावी रणनीति बना रही हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस का मुख्य फोकस महिलाओं पर है। महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने की घोषणा हो चुकी है। पार्टी नेता कहते हैं कि उनकी चुनावी रणनीति, जाति आधारित नहीं है। प्रियंका गांधी, 27 नवंबर को महोबा 'बुंदेलखंड' में जा रही हैं। वे 30 नवंबर को मेरठ पहुंचेंगी। वे अपनी हर जनसभा में ऐसे वादे कर रही हैं जो परपंरागत राजनीति से हटकर हैं। यानी धर्म और जाति की राजनीति से परे हैं। कांग्रेस महासचिव कहती हैं कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी चुनाव जीत जाती है तो हर जिले में स्किल डेवलपमेंट स्कूल खुलेगा। लड़कियों को स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक स्कूटर देने का भी वादा हो रहा है। लखीमपुर खीरी में प्रियंका जिस तरह से पहुंची, मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज उन्हीं को मिला। उन्होंने पीड़ित परिवार को पंजाब और छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से 50-50 लाख रुपये का मुआवजा भी दिलवाया। आगरा में एक सफाई कर्मचारी की पुलिस हिरासत में हुई मौत का मामला सामने आया था। प्रियंका गांधी, आगरा के लिए रवाना हो गईं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया, मगर हंगामा मचने के बाद प्रियंका को चार लोगों के साथ आगरा जाने की इजाजत मिल गई। लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर कुलियों से मुलाकात और मृतक किसानों के परिजनों के पास जाना, ये सब प्रियंका की चुनावी रणनीति है। अब ऐसे में वे खुद चुनाव नहीं लड़ती हैं, तो उससे पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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