अमर उजाला विश्लेषण: सफल हुई तो शानदार मानी जाएगी अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग, बदलेगी राज्य की राजनीतिक धारा

Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 01 Dec 2021 03:11 PM IST

सार

जब राज्यसभा का चुनाव चल रहा था, तो अखिलेश यादव ने राजा भैया से अपने उम्मीदवार को वोट देने का संदेश भिजवाया। राजनीति के गलियारे में बताया जाता है कि राजा भैया ने वोट भाजपा के प्रत्याशी को दे दिया। अखिलेश यादव ने इसे कड़वे घूंट की तरह लिया और प्रतापगढ़ की कुंडा समेत अन्य सीटों पर प्रत्याशी तैयार करने की चुपचाप हलचल तेज कर दी...
बुंदेलखंड में अखिलेश यादव की रैली
बुंदेलखंड में अखिलेश यादव की रैली - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी की तीखी आलोचना करने वाले ओमप्रकाश राजभर आजकल सपा के साथ हैं। अंदरखाने की मानें तो हाथ से छिटक रहे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने जन्मदिन पर मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद ले लिया है। यह कुछ बानगी है, जिसे समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव बड़े करीने से बिना शोर शराबे के विधानसभा चुनाव 2022 के लिए सजाया है। उत्तर प्रदेश के छोटे-छेटे छह-सात क्षेत्रीय दलों और कुछ संगठनों को जोड़कर अखिलेश यादव राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग की नई इबारत लिखने जा रहे हैं। सपा के रणनीतिकारों की मानें तो उनकी काट खोज पाना भाजपा के लिए बहुत आसान नहीं होगा।
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कौन-कौन है अखिलेश के साथ?

  • भाजपा को चुनौती देने के लिए अभी जिन कुनबों को अखिलेश यादव ने अपने साथ जोड़ा है, उनमें बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर, पूर्व विधानमंडल दल के प्रभावशाली नेता लालजी वर्मा समेत मायावती की पार्टी के आधा दर्जन से अधिक विधायक और तमाम नेता हैं। बसपा एक तरह से विधायकों से खाली हो गई है और मायावती को इन्हें चुनावी मेंढक कहना पड़ा।
  • दलों के रूप में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह भी सपा से ताल मिला रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड में प्रभाव रखने वाला महान दल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटलैंड मे पैठ रखने वाला जयंत चौधरी का राष्ट्रीय लोकदल, ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, डा. संजय सिंह की जनवादी (सोशलिस्ट) पार्टी, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल (लोक.), कृष्णा पटेल की अपना दल (कमेरावादी), पॉलिटिकल जस्टिस पार्टी के राजेश सिद्धार्थ, लेबर एस पार्टी के राम प्रकाश बघेल, अखिल भारतीय किसान संघ के रामराज सिंह पटेल जैसे तमाम नेताओं और संगठनों के साथ अखिलेश यादव बेहद सूक्ष्म स्तर पर जाकर राजनीतिक दायरा बढ़ा रहे हैं।  
  • राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी है।

कड़वा घूंट पीने के बाद अखिलेश ने चली ये चाल

जब राज्यसभा का चुनाव चल रहा था, तो अखिलेश यादव ने राजा भैया से अपने उम्मीदवार को वोट देने का संदेश भिजवाया। राजनीति के गलियारे में बताया जाता है कि राजा भैया ने वोट भाजपा के प्रत्याशी को दे दिया। अखिलेश यादव ने इसे कड़वे घूंट की तरह लिया और प्रतापगढ़ की कुंडा समेत अन्य सीटों पर प्रत्याशी तैयार करने की चुपचाप हलचल तेज कर दी। जबकि सपा यहां से उम्मीदवार नहीं उतारती थी और मायावती के धुर विरोधी राजा भैया को मुलायम सिंह यादव के वक्त से मदद मिलती रही। बताते हैं राजनीतिक रूप से अजेय बनी यह सीट मुसीबत खड़ी करती आई, तो राजा भैया ने भलाई के रास्ते को चुन लिया।

अखिलेश के एक करीबी नेता बताते हैं कि बीच में राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी डगमगाने लगे थे। कभी कांग्रेस के दीपेंद्र हुड्डा से दोस्ती तो कभी भाजपा के सूत्र से संपर्क कर रहे थे। सपा से सीटों के संख्या की मांग बढ़ गई थी। बताते हैं कि अखिलेश के निर्णायक रुख के संकेत के बाद सबकुछ रास्ते पर आ गया।

इसी तरह से गोरखपुर, देवरिया, पडरौना, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, भदोही, मिर्जापुर, बनारस समेत तमाम जिलों में निषादों की तादाद है। संजय निषाद और प्रवीण निषाद भाजपा के साथ जुड़े तो अखिलेश ने धीरे-धीरे जमुना निषाद के परिवार, रामभुआल निषाद के नेतृत्व को संजीवनी देनी शुरू कर दी है। भदोही में विधायक विजय मिश्र जेल में हैं। उनका परिवार और पूरे कुनबे का समर्थन अखिलेश यादव के साथ है। जौनपुर समेत तमाम जिलों में पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा ने ब्राह्मण मतो में सेंध लगाने के लिए चौसर बिछा रखी है। बसपा की एक विंग को भरोसा है कि वह कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी द्वारा खड़ी की जा रही सरकार विरोधी लहर की पूरी महफिल लूट लेगी।  

गोरखपुर भी आसान नहीं रहेगा योगी के लिए

यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पता है कि पूरा पूर्वांचल और अवध तक का हिस्सा अपने पाले में लाना बहुत बड़ी चुनौती है। जमुना निषाद के परिवार को आगे करने के साथ-साथ मल्लाहों से लेकर तमाम छोटी जातियां कुछ प्रतिशत छिटककर सपा का साथ दे सकती हैं। 30 फीसदी के करीब ब्राह्मण भी गोरखपुर मंडल में पाला बदल सकते हैं। वैश्य, निषाद, कुर्मी, एससी, एसटी से भी कुछ झटका लग सकता है।    

क्या होगा शिवपाल यादव का?

अखिलेश हवा का रुख पहचान रहे हैं और वक्त का इंतजार कर रहे हैं। उनके चाचा शिवपाल अपनी राजनीति का एजेंडा लेकर घूम रहे हैं और सैफई से लेकर लखनऊ तक अखिलेश का संदेशा आने की भनक तलाश रहे हैं। अखिलेश के करीबी समाजवादी पार्टी के नेता कहते हैं कि कुछ अच्छा होगा। अखिलेश कहते हैं कि चाचा का पूरा सम्मान होगा। जो खबर पता चल रही है, वह यह कि शिवपाल सिंह अपनी जसवंत नगर की सीट और एक दो और सीटों की योजना बना लें, जो खास चार-पांच उम्मीदवार हों, बता दें। मूल्यांकन में वरीयता दी जाएगी। साथ आ जाएंगे तो पूरे प्रदेश में समाजवादी पार्टी का झंडा जरा जोरदार तरीके से लहराएगा। इन घटना क्रमों के बीच शिवपाल सिंह हर विकल्प को खुला रखना चाहते हैं, ताकि अंत में हाथ न मिलाना पड़े। मुलायम सिंह यादव भी चाहते हैं, इसलिए बताते हैं कि सर्दी के मौसम में गोमती का पानी थोड़ी तासीर लेकर बहेगा और दिसंबर-जनवरी तक कुछ फैसला हो जाएगा।  

राजस्थान का यह नारा भी अखिलेश के लिए मुफीद है

राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले वसुंधरा राजे की जनसभा के दौरान यह नारा जोर से लगा था- 'मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं'। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ऐसा कोई नारा लगवाने वाले हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि उनके भीतर पक रही थीम भी कुछ इसी तरह की है - 'मोदी तुझसे बैर नहीं, योगी तेरी खेर नहीं'। बताते हैं कि इस नारे और थीम का बीज मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा में बो दिया था। अखिलेश यादव ने भी अभी तक इसकी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी है। समाजवादी पार्टी के ही एक नेता बताते हैं कि अन्य पिछड़ा वर्ग में भी संदेश सही जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिन्ना को जोड़कर दिया गया बयान रही सही कसर पूरी कर दे रहा है। हमें इससे नुकसान कम, फायदा ज्यादा है।

दो दलों के परफामेंस पर भी टिकी है निगाह

समाजवादी पार्टी बड़े माइक्रो स्तर पर काम कर रही है। अपनी जमीनी तैयारी, पिछड़ी जातियों को जोड़ने की मुहिम, जाटव, बिंद, पासी, मुसहर समेत तमाम जातियों में पैठ बढ़ाने की कोशिश के साथ-साथ कांग्रेस और बसपा के परफामेंस पर निगाह है। हालांकि भाजपा की भी निगाह इसी पर टिकी है। दोनों दलों के रणनीतिकारों को लग रहा है कि मिशन प्रियंका चुनाव मतदान के हिसाब से उम्मीद से भी नीचे कोई एक-डेढ़ दर्जन सीट ही पास सकेगा। इसी तरह बसपा के पास से बड़ा जनाधार (कोइरी, कुर्मी, मौर्या, वर्मा, पटेल, कुशवाहा, राजभर आदि) खिसक रहा है। ब्राह्मणों का 30-35 फीसदी मतदाता विकल्प खोज रहा है। यह सभी जातियां राजनीति के विकल्प में बसपा या भाजपा में ही जाएंगी। तैयारी तेजी से चल रही है। सपा के रणनीतिकार बताते हैं कि यही उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की उम्मीद और महत्व है तो सपा के लिए अच्छा अवसर।

इस नए प्रयोग से बहुत उम्मीदें हैं अखिलेश यादव को

पिछले तीन चुनावों में अखिलेश यादव ने तीन प्रयोग किए। 2012 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की एकजुटता, युवा शक्ति के कनेक्ट पर ध्यान दिया। सपा के रणनीतिकार कहते हैं कि इसमें 2007-12 के कार्यकाल के दौरान मुख्यमंत्री मायावती के कामकाज से जनता की नाराजगी ने बड़ी सफलता दिला दी। पार्टी को 224 सीट, 29.13 फीसदी वोट मिल गए। मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को राजनीतिक उत्तराधिकार देते हुए मुख्यमंत्री बना दिया। बाद में अखिलेश ने सब हासिल कर लिया।

दूसरा प्रयोग 2017 में हुआ। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की खाट पंचायत और कोशिशों को देखकर चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार प्रशांत किशोर, प्रियंका गांधी उनके कार्यालय सहायक धीरज श्रीवास्तव सबकी पहल पर कांग्रेस से समझौता हो गया। लेकिन सीटें आई केवल 47, वोट मिले 21.82 फीसदी। बताते हैं कि सपा परिवार के अंदरूनी झगड़े, सरकार विरोधी लहर, कांग्रेस द्वारा खड़ा किया गया राजनीतिक अभियान और प्रधानमंत्री मोदी के आभामंडल के अलावा अमित शाह की छोटे दलों, अन्य पिछड़ा वर्ग को जोड़ने की सामाजिक इंजीनियरिंग ने सब बिगाड़ दिया। समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों ने भी कांग्रेस के साथ समझौते को राजनीतिक और रणनीतिक भूल मान ली।

तीसरा प्रयोग 2019 में हुआ। अखिलेश यादव ने बुआ मायावती से रिश्ते की कोशिश शुरू की। लेकिन राजनीतिक फायदा होने की बजाय सीटें कम आई। पत्नी डिंपल यादव भी चुनाव हार गई। बसपा प्रमुख मायावती ने इसे अपनी राजनीतिक भूल मान ली। पार्टी के रणनीतिकारों से बातचीत के निकले निष्कर्ष में यह एक नया प्रयोग लग रहा है। समाजवादी पार्टी 2022 का विधानसभा चुनाव बहुमत से जीत गई तो फिर उत्तर प्रदेश में समाजवाद का डंका बजेगा। इस बार उन्होंने राष्ट्रीय और राज्य की राजनीतिक पार्टी की बजाय बहुत छोटे, क्षेत्रीय दलों, छोटे संगठनों के साथ मेलमिलाप का रास्ता चुना है। देखना है अखिलेश का जादू कितना चलता है।
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