फॉर्मूला लेखन से नारी मुक्ति संभव नहीं है - चित्रा मुद्गल 

चित्रा मुदगल
                
                                                             
                            ‘बैठक’ अमर उजाला की अनूठी साहित्यिक पहल है, जो साहित्य के प्रति हमारे सरोकार और प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। बैठक की तीसरी कड़ी में साहित्यिक जुगलबंदी समकालीन साहित्य के दो सुपरिचित और समर्थ चेहरों के बीच थी। मशहूर साहित्यकार चित्रा मुद्गल और मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने हिस्सा लिया।
                                                                     
                            

उन्होंने एक-दूसरे से पूछा। एक-दूसरे को बताया। दो घंटे तक चली इस बैठक में स्त्री की सोच और समाज की दिशा के बीच स्त्री के द्वारा स्त्री-विमर्श और पुरुष के द्वारा स्त्री-विमर्श से लेकर समाज तक पर बातें हुईं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस पहल से स्त्री-विमर्श का वह चेहरा सामने आएगा, जिसकी जरूरत समाज को है। पढ़िए दोनों के बीच चली चर्चा का पहला भाग। 

चित्रा मुद्गल - वर्तमान में जो स्त्री विमर्श है। यह समाज, सामाजिक कार्य करने वालों के साथ-साथ है, लेखकों के साथ-साथ है। जो लेखक जिस प्रदेश से आया है, उस प्रदेश की स्त्री को तो छोड़ नहीं सकता, चाहे वह पितृसत्तात्मक हो या कुछ और। लेकिन स्त्री तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अपने मन को कहां जीती है, किस कोने में जीती है? यहां तक पितृसत्ता के दलन, शोषण उन सबकी बात होती रही है और यहीं स्त्री ने यह जाहिर किया कि उसका भी एक मन है, था। और जब पुरुष ने उसे लिखा है, तो इस मन को भी लिखा है।
शरतचंद्र ने तो स्त्री मन को बहुत ज्यादा लिखा ही है। इसी तरह से हम देखते हैं कि पितृसत्ता पर बड़ा आरोप लग जाता है। ऐसा नहीं है। राजा राममोहन राय हों या ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्त्री को आगे बढ़ाने के लिए उस दौर से काम कर रहे हैं। पितृसत्ता इसी तरह, बेटियों के लिए, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए जगह बनाती है, खुद पीछे हटता है, उन्हें जगह देता है। ऐसे में बिना पुरुष के स्त्री-विमर्श कैसे संभव है? जाहिर है, पुरुष की अनदेखी करने वाला स्त्री-विमर्श एकांगी है, अधूरा है। खास सांचे में ढला है।   

मैत्रेयी पुष्पा- मेरा जो समाज है, वह एक ग्रामीण समाज है। मैं पहाड़ और पूरे देश की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। जहां से मैं आई हूं, उस समाज में ही थोड़ी-सी जागरूकता आ जाए, तो मेरे लिए बहुत है। शिक्षा बहुत जरूरी है। लेकिन मैंने देखा है कि डिग्री वाली औरतें बड़ी मूर्ख होती हैं। मैं नहीं जानती थी, स्त्री-विमर्श क्या होता है? जब मैं लिखने लगी, तो मुझे बताया गया कि यह तुम तो स्त्री-विमर्श लिख रही हो। मैंने साहित्यकारों की बात     मान ली। 

चित्रा मुद्गल- किन साहित्यकारों की बात मान ली। नाम बताइए।
मैत्रेयी पुष्पा- मैंने इसलिए मान ली कि यहां बहुत बड़े-बड़े दिग्गज थे। मैं नई-नई आई थी।  मेरी उम्र उस वक्त 45 वर्ष की हो चुकी थी। उतनी उम्र तक मुझे लिखने का मौका नहीं मिला। तो मैंने सोचा, ‘हां’ शायद होगा स्त्री विमर्श। लोगों ने कहा कि हां किया है। ठीक है, उस वक्त राजेंद्र यादव का भी एक स्त्री विमर्श था। मैं उनसे कहती भी थी कि राजेंद्र जी आप भी क्या छापते रहते हैं? लेकिन वह तो मानते ही नहीं थे। उन्होंने स्त्री-विमर्श चलाया। जाहिर है, वह स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के लिए माने जाएंगे और हमेशा जाने जाएंगे।  
चित्रा मुद्गल- तुम्हें कभी मालूम नहीं था कि तुम क्या लिख रही हो। तुम्हें मालूम नहीं था कि स्त्री-विमर्श क्या होता है? तुम वह लिख रही थी, जो तुम्हारे अनुभवों के दायरे में था। और तुमने मुक्त होकर उस औरत को लिखा। यह बहुत बड़ी बात है। मैत्रेयी की सकारात्मकता को किसने कितना चुना, वह मेरे सामने प्रश्न नहीं है। फिर भी, मैं मैत्रेयी से यह बात पूछना चाहती हूं कि आपने ग्रामीण इलाकों से, अपने गांव से सिर्फ उस स्त्री को ही क्यों चुना? पहली चीज। दूसरी चीज, अगर आपके मन में यह भावना नहीं थी कि स्त्री को लिखना है, तो अनायास स्त्रियां ही आती चली गईं? मैं सोचती हूं कि जब एक सृजक स्त्री को लिखता है, तो उसमें ग्रामीण इलाकों की जो औरत है, वह बड़ी बोल्ड दिखती है, जो शहरों में नहीं दिखती। जब लेखन में अनायास ही स्त्री आती है, तो इसी तरह के प्रसंग क्यों?     

मैत्रेयी पुष्पा- अच्छा। एक बात बताइए। लेखक अपने दायरे से छिटक कर कहां पहुंच जाए? विदेशों में पहुंच जाए। वहां की कहानी लिख दे। तो मुझे नहीं लगता कि वह अपना लेखकीय कर्तव्य निभा रहा है। मेरे अनुभव का जो दायरा है बुंदेलखंड या ब्रज, तो स्त्रियां वहीं की आती हैं। 
अनायास आती हैं। इसे मेरी सीमा समझ लीजिए या मेरा सामर्थ्य। मेरा सामर्थ्य उतना नहीं कि पूरा ब्रह्मांड नाप दूं। एक उदाहरण मैं आपको देती हूं। ईसुरी स्वतंत्रता संग्राम के जमाने का है।  ईसुरी पर यह आरोप है कि उन्होंने एक भी बार स्वतंत्रता-संग्राम में भाग नहीं लिया, लेकिन जब मैंने उपन्यास लिखा, तो मैंने  ईसुरी को नहीं, रजऊ को उसकी सिपाही बनाया और वह ढोलकी डालकर बेडनी बन गई और वह उनको जगाती फिरी।

चित्रा मुद्गल- यहां मैत्रेयी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने रजऊ को ऐसा बनाया। यह नहीं कि कहीं से बीनकर ले आईं। यहां एक अंतर्विरोध है। 
मैत्रेयी पुष्पा- नहीं, कोई अंतर्विरोध नहीं है। मैंने अपने किरदार को बुंदेलखंड से उठाया। विश्वविद्यालयों में जब इस पर कोई रिसर्च होती है, तो भी लोग कहते हैं कि रजऊ काल्पनिक चरित्र है। लेकिन जहां-जहां लगता है कि तथ्य सही हैं, तो मैं उन्हीं पर काम   करती हूं।

चित्रा मुद्गल- मेरा प्रश्न यह था मैत्रेयी जी कि आपकी जो स्त्रियां हैं, वह धड़ के निचले हिस्से में ही क्यों क्रांति करती हैं। पुरुषों से संबंध कायम करके.... मैं इस पर आगे नहीं जाना चाहती।
मैत्रेयी पुष्पा-यह मामला है, 'चाक' उपन्यास का। 'चाक' में लोगों ने पढ़ा, लेकिन यह नहीं देखा कि इसके पीछे मकसद क्या है? उसमें ऐसे दो सीन हैं। मैं कब मना कर रही हूं। उसमें है, लेकिन वह किसलिए है। क्या औरत उसमें मजे ले रही थी। नहीं। कई बार ऐसा भी होता है कि स्त्री को अपने शरीर के साथ ही प्रस्तुत होना पड़ता है। महादेवी वर्मा का एक कथन है कि जब युद्ध होता है, तो नर्स का स्पर्श उसे शांति देता है, न कि उसके जो विचार आदि हैं। ऐसा भी मौका आता है। यह इतना बड़ा पाप नहीं है, जैसा कि हमारी साहित्यिक बिरादरी ने हंगामा कर दिया। आज तक कर रहे हैं। 

(जारी है...)
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4 years ago

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