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Ahmad Rahi ghazal jis raah se bhi guzar gaye hum

इरशाद

अहमद राही की ग़ज़ल ‘जिस राह से भी गुज़र गए हम’

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जिस राह से भी गुज़र गए हम
हर दिल को गुदाज़ कर गए हम

जल्वे थे किसी के कार-फ़रमा
हर नक़्श में रंग भर गए हम

क्या जानिए क्या था उस नज़र में
उलझे तो सँवर सँवर गए हम

हम भाँप गए थे रंग-ए-महफ़िल
कहने को तो बे-ख़बर गए हम

हर दिल था उदासियों का माबद
हर गाम ठहर ठहर गए हम

बे-मेहरी-ए-दोस्त तल्ख़ी-ए-ज़ीस्त
किस किस से निबाह कर गए हम

उम्मीद-ए-वफ़ा पे जीने वालो
उम्मीद-ए-वफ़ा में मर गए हम

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