मुसाफ़िरों का कभी एतिबार मत करना - 'क़ैसर'-उल जाफ़री

qaisar ul jafri ghazal musafiron ka kabhi aitbaar mat karna
                
                                                             
                            

मुसाफ़िरों का कभी एतिबार मत करना
जहां कहा था वहां इंतिज़ार मत करना

मैं नींद हूं मिरी हद है तुम्हारी पलकों तक
बदन जला के मिरा इंतिज़ार मत करना

मैं बच गया हूं मगर सारे ख़्वाब डूब गए
मिरी तरह भी समुंदर को पार मत करना

बहा लो अपने शहीदों की क़ब्र पर आंसू
मगर ये हुक्म है कतबे शुमार मत करना

हवा अज़ीज़ है लेकिन ये उस की ज़िद क्या है
तुम अपने घर के चरागों को प्यार मत करना

ये वक़्त बंद दरीचों पे लिखा गया 'क़ैसर'
मैं जा रहा हूं मिरा इंतिज़ार मत करना

1 year ago

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