अनुराग अनंत: तुम हिचकी की तरह आई थीं और किसी दर्द की तरह गईं

नींद पर कविता
                
                                                             
                            तुम हिचकी की तरह आई थीं
                                                                     
                            
और किसी दर्द की तरह गईं
जाने से कहाँ कोई जाता है
उसका कुछ न कुछ रह ही जाता है
जैसे मेरी दादी की छड़ी रह गई
और तुम्हारी अनकही बात
खेत में बीज रोपते वक़्त
या किसी ढलान से उतरते हुए
तुम्हारी बहुत याद आती है
मेरा हमशक्ल दीपक के नीचे
अँधेरे की शक्ल में रहता है आगे पढ़ें

3 weeks ago

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