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गुलाब खंडेलवाल की कविता: वह बात जो विदा के समय 

गुलाब खंडेलवाल की कविता: वह बात जो विदा के समय
                
                                                                                 
                            वह बात जो विदा के समय
                                                                                                

एक अनाम दृष्टि कह गयी,
वह बात अंत तक मेरी चेतना में
फँसी रह गयी!
जैसे माला के धागे में कोई गाँठ पड़ जाये,
उँगली जब भी फिरे, मनका वहीं अड़ जाये;
जैसे कोई तितली हिम-शिला के बीच जम गयी हो,
जैसे कोई पायल की झंकार पास आते-आते थम गयी हो;
मैंने कितना भी कहना चाहा, ओ रहस्यमयी!
एक बार तो मन की गाँठ खोल दे,
एक बार तो यह हिम-शिला पिघला दे,
एक बार तो हँसकर कुछ बोल दे!
पर मेरी कल्पना के महल
बनने से पूर्व ही ढह गये,
और तुम्हारी अनाम दृष्टि के संकेत
अंत तक अनखुले ही रह गये
1 month ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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