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मुनव्वर राणा यानि इंसानी रिश्तों में लिपटा एक अज़ीम शायर

काव्य चर्चा

मुनव्वर राणा यानि इंसानी रिश्तों में लिपटा एक अज़ीम शायर

अमर उजाला, काव्य डेस्क

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मुनव्वर राना ऐसे शायर हैं जो इश्क़ को प्रेमी और प्रेमिका से सराबोर तो करते ही हैं साथ ही वह इसे एक अलग मुकाम यानी अन्य इंसानी रिश्तों की अतल गहराईयों में भी ले जाते हैं। हिंदी और उर्दू दोनों पर समान अधिकार रखने वाले राना ने मां और बेटियों को अपनी गज़लों में ऐसी नवाज़िशें दी हैं, जो कहीं और देखने को नहीं मिलती- 

हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं 
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं 

मुस्तकिल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है 
रफ्ता-रफ्ता सभी घरबार में खो जाते हैं 

इतना सांसों की रफाकत पे भरोसा न करो 
सब के सब मिट्टी के अम्बार में खो जाते हैं 

मेरी खुद्दारी ने अहसान किया है 
मुझ पर वर्ना जो जाते हैं, दरबार में खो जाते हैं  

कौन फिर ऐसे में तनकीद करेगा तुझ पर 
सब तेरे जुब्बा-ओ-दस्तार में खो जाते हैं  
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मामूली एक कलम से...

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