प्रेम करना और प्रेम बांटना चाहती हूं- चित्रा मुद्गल 

चित्रा मुदगल, मैत्रेयी पुष्पा
                
                                                             
                            ‘बैठक’ अमर उजाला की अनूठी साहित्यिक पहल है, जो साहित्य के प्रति हमारे सरोकार और प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। बैठक की तीसरी कड़ी में साहित्यिक जुगलबंदी समकालीन साहित्य के दो सुपरिचित और समर्थ चेहरों के बीच थी। मशहूर साहित्यकार चित्रा मुद्गल और मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने हिस्सा लिया।
                                                                     
                            
पाठकों  के लिए पेश है जुगलबंदी का रैपिड फायर राऊंड। जिसमें दोनों ही शख्सियतों ने खुलकर जवाब दिए। 

- अभी भी आपको कोई प्रेम करना बचा है क्या? 
चित्रा मुद्गल  - प्रेम करना बहुत बचा हुआ है। प्रेम करना चाहती हूं, प्रेम बांटना चाहती हूं। लेकिन वो प्रेम उस चेतन से है, जिसकी कामना हर इंसान में हो, वो मेरे बेटे में भी हो और मेरी बेटी में भी हो। 
मैत्रेयी पुष्पा - जब तक मैं जिंदा रहूंगी। प्रेम करना बचा है। लोग कहत हैं कि अब तो उम्र हो गई है। लेकिन क्या उम्र से प्रेम होता है? उम्र से प्रेम न तो छोटेपन में होता है, न बड़ेपन में।

-क्या कोई नफरत बची है मन में?
चित्रा मुद्गल - नफरत संकीर्णता से है। नफरत अहंकार से है। नफरत हर उस चीज से है, जो अपने अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचता।
मैत्रेयी पुष्पा - नहीं, नफरत किसी के प्रति होती नहीं है। कोशिश करती हूं नफरत करने की, कर नहीं पाती हूं।

-जिंदगी में कभी किसी को गाली देने का मन किया है?
चित्रा मुद्गल - गाली तो नहीं आती है। गालियां सुनी बहुत हैं। मां-बहन की गालियां तो अपमान है। मैं एक स्त्री होकर एक स्त्री के नाम की गालियों के बारे में सोच भी कैसे सकती हूं? इस समाज में जब तक मां-बहन पर गालियां खत्म नहीं होतीं, स्त्री-विमर्श कभी पूरा नहीं होगा । 
मैत्रेयी पुष्पा - मैं स्त्री होकर मां-बहन के लिए क्या गाली सोचूंगी और लिखूंगी? हां, मुझे कहावतें इतनी याद हैं कि गाली से ज्यादा लगती हैं। 

-आपको दो-दो टिकट मिले हैं और चांद पर जाना है, दूसरा किसे साथ ले जाना चाहेंगी?
चित्रा मुद्गल - मैं चांद पर नहीं, मैं धरती पर ही रहना चाहती हूं। यह सपनों में जीने वाली बात है।  
मैत्रेयी पुष्पा - कोई औरत तो नहीं जाएगी साथ में। ‘चांद के पार चलें ‘ वाला गाना याद आ गया। मेरा दोस्त ही जाएगा मेरे साथ साहित्य में।

-सर्वश्रेष्ठ नारी किरदार?
चित्रा मुद्गल – ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ की निर्गुनियां
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4 years ago

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