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मेरे अल्फाज़

पहचान न मिलेगी

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शून्य से अनन्त तक जाओ मगर,
सारी सफलतायें तुम पाओ मगर।
जब भी याद आयेगी तुम्हें घर की,
तब कहीं मन को लगा कर देखो।

घर छोड़ते वक्त यह ध्यान रखना,
आँगन की धूप- छांव याद रखना।
रिश्ते जरा सलीके से निभाते चलो,
अपनों को खुशी से गले लगाते चलो।

देर न करना कभी घर वापसी में,
कही गलियां भी सवाल न पूछने लगें।
जंग लगे तालों में फिर चाभी न लगेगी,
अपनो मे खोई हुई वो पहचान न मिलेगी।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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