आदिकवि वाल्मीकि

                
                                                             
                            कर में कृपाण सीने को तान,
                                                                     
                            
ह्रदय पाषाण कब से खड़ा था।
कर्म का प्रभाव भयानक था भाव
तलाश में कब से जिद पर अड़ा था॥

वियाबान जंगल चंचल वो मन,
इधर देखता उधर लूटता था।
प्रारब्ध था या कर्म की गति,
कर्म लूट का नहीं छूटता था॥

परिवार प्रिय जन राह देखते,
हमको भोजन मिले यह चाह थी।
अधर्म-धर्म से कोई मतलब न था,
पाप-पुण्य की ना कोई परवाह थी॥

ना दिन को तसल्ली ना रातों को चैन,
नैनों में पंथी की आस थी।
हुई शाम तक ना आया कोई,
बेचैनी दिल में बड़ी खास थी॥

ना भान था ना अनुमान था,
जो देखे दिव्य साथु आते सामने।
तानकर चला वो कृपाण कर,
अपने ही नियत कर्म को साधने॥

ठहरो, ठहरो यहीं जब उसने कहा,
सन्त बोले हम तो ठहरे, तू ठहरेगा कब।
जिनके लिए पाप करता फिरे,
क्या तेरे पाप के भागी वे सब॥


बात तो थी जँची, फिर भी नीयत फँसी,
दिव्य सन्तों को तरुवर से बाँधकर।
प्रश्न नीयत का था ,प्रश्न जरूरत का था,
प्रियजन से पूछा था आनकर॥

अजीब उत्तर मिला ,जानकर हिल गया,
सबने कहा तेरा काम बस तेरा काम है
देख तू रास्ता कौन सा है भला,
तेरे कर्मों का तेरा ही अन्जाम है॥

पाप-पुण्य से हमारा ना वास्ता,
रास्ता है तेरा हम ना शामिल कभी।
पेट सबका तो तुझको भरना पड़े,
रिवाजें यही कर्म करते सभी॥

सुन सिंहर सा उठा थी बेचैन नजर,
दिल ने दिल से पूछा हारकर।
दिल से निकली थी आह ढूँढता था दवा,
खुद को ऋषियों के चरणों में डालकर ॥

मन ग्लानि लिए, खोल बन्धन दिए,
ऋषि चरणों में मन समर्पित हुआ।
राम का नाम ले ऋषि कहने लगे,
राम का नाम ना ह्दय से भाषित हुआ॥

राम आया नहीं बस मरा था बचा,
मरा- मरा कहते राम मिल गए।
सन्त कृपा बड़ी कोई उपमा नहीं,
सन्त कृपा से पाप सब मिट ही गए॥

राम के नाम से जो समाधि लगी,
वल्मीक जो जमीं वाल्मीकि बन गए।
नाम प्रभाव से भक्ति के भाव से,
सत्य पथ के प्रदर्शक बन गए॥

दिव्य से दिव्यता का उजाला लिए,
कवि आदि कवि रामायण रची।
शरद की चाँदनी पा जिसे धन्य हुई,
दिव्य वाल्मीकी हुए हैं आदि कवि॥

राम शाश्वत सदा शाश्वत उनकी कथा,
दिव्य से परिपूर्ण रामायण सदा।
राम के नाम की होगी चर्चा जहाँ,
आदि वाल्मीकि कवि भी होंगे वहाँ॥

हरिशंकर 'हरि'
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3 months ago

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