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मेरे अल्फाज़

अंग्रेजी का प्रकोप

Shashi Sharma

8 कविताएं

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आ गया समय
अब ऐसा की
अपनी मां को सब
भूल रहे,
अंग्रेज़ी को अपना कर सब
संस्कार हैं भूल रहे।।

अभिवादन के नाम पर
हाय-हैलो सब
बोल रहे,
चरण स्पर्श को भूलकर
बेशर्मी से
गले अब मिल रहे।।

जिस भाषा में
ना रिश्ते-नाते
तुम उसको अब
अपनाए रहे,
तुम अपने मामा को भी
अंकल खुद बनाए रहे।।

देश की नारी
को देखो तो
वह पति-देव शब्द
भूल रही,
तोंद फुलाए बुढ़ऊ को
बेबी कह के इतराए रही।।

कॉन्वेंट में पढ़ाते हो बच्चे को
तो संस्कार कहां से
पाओगे,
बोओगे पेड़ बबूल का
तो आम कहां से
खाओगे।।

यह सब कुछ नहीं हैं
केवल अंग्रेजी का
प्रकोप हैं,
हिंदी वैश्विक नहीं हैं
यह बस तुम्हारी
अंग्रेजियत की सोच हैं।।

लेखक
शशि रंजन शर्मा
दोन-दरौली,सीवान-बिहार

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