मोहम्मद अल्वी ग़ज़ल: और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी

कोई चारा न था और कोई सूरत न थी
                
                                                             
                            

और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी 
उस के रहे हो के हम जिस से मोहब्बत न थी 
 
इतने बड़े शहर में कोई हमारा न था 
अपने सिवा आश्ना एक भी सूरत न थी 
 
इस भरी दुनिया से वो चल दिया चुपके से यूँ 
जैसे किसी को भी अब उस की ज़रूरत न थी 
 
अब तो किसी बात पर कुछ नहीं होता हमें 
आज से पहले कभी ऐसी तो हालत न थी 
 
सब से छुपाते रहे दिल में दबाते रहे 
तुम से कहें किस लिए ग़म था वो दौलत न थी 
 
अपना तो जो कुछ भी था घर में पड़ा था सभी 
थोड़ा बहुत छोड़ना चोर की आदत न थी 
 
ऐसी कहानी का मैं आख़िरी किरदार था 
जिस में कोई रस न था कोई भी औरत न थी 
 
शेर तो कहते थे हम सच है ये 'अल्वी' मगर 
तुम को सुनाते कभी इतनी भी फ़ुर्सत न थी 

3 months ago

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