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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुड़ मुड़ के देखता हूं

अपनी इस नज़्म को नूरजहां के नाम कर चुके हैं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ मशहूर इन्क़लाबी शायर जिन्होंने प्रगतिशील विचारों को अपनी शायरी का आधार बनाया और नूरजहां यानी मल्लिका-ए-तरन्नुम जिनके सुर-ओ-साज पाकिस्तान के साथ-साथ विदेश की धरती तक भी फ़ैले। दोनों का नाम एक साथ लिए जाने पर फ़ैज़ की मशहूर नज़्म याद आती है जिसे नूरजहां ने इतना ख़ूबसूरत गाया था कि फ़ैज़ ने उस नज़्म को नूरजहां के नाम ही कर दिया। 
जब किसी मुशायरे में फ़ैज़ से वह नज़्म सुनाने की ग़ुज़ारिश की गई थी तो उ्होंने कहा कि, "वह नज़्म अब मेरी नहीं रही, नूरजहां की हो गई है।"


अगली स्लाइड में पढ़ें वह नज़्म और सुनें नूरजहां की आवाज़

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