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nida fazli and krishn adeeb first meeting

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जब पहली ही मुलाक़ात में निदा फ़ाज़ली से कृष्ण अदीब ने रूपए मांगे… जानें पूरा किस्सा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यह किस्सा वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘चेहरे’ से लिया गया है। निदा फ़ाज़ली बताते हैं कि,

कई साल पहले की बात है, लुधियाना में मुशायरा था। लुधियाना पंजाब में था और सारा पंजाब गोली, तलवार और बमों के धमाकों से बेताब था। सारे क्षेत्र में दहशत फ़ैली हुई थी।
लुधियाना में रेल सूर्योदय से दो घंटे पहले पहुंच गयी थी। दूसरे यात्रियों की तरह मैं भी मुसाफ़िर खाने में एक कुर्सी पर बैठ गया। यात्रा की थकान ने आंखों में नींद भर दी। अखबारों की ख़बरें, हथियारबंद आतंकवाद बन कर नींद भरी आंखों में घूम रहीं थीं कि अचानक एक जोर का धमाका हुआ। नींद टूटी तो पता चला कि जिसे मैंने बेहोशी में धमाका समझा था वह होश में इकहरे बदन और चेहरे में धंसी हुई आंखें, लम्बे कद और गर्म सूट और टाई का लिबास पहने एक इंसान था। भारी ठेठ पंजाबी लहजे में उसने पूछा-

तुम निदा फ़ाज़ली हो?

जी हां! मैंने चौंकते हुए जवाब दिया।

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उसने मेरे मुंह से जी हां सुनते ही...

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