जब एक उपन्यासकार ने धर्मवीर भारती से कहा, “तेरी तो एक ही उपन्यास से टैं बोल गयी”

धर्मवीर भारती
                
                                                             
                            

रवीन्द्र कालिया की लिखी संस्मरणात्मक किताब ‘ग़ालिब छुटी शराब’ के पन्द्रहवें अध्याय में उन्होंने एक दिलचस्प प्रसंग लिखा है। वह लिखते हैं कि,

उस दिन पंजाबी के उपन्यासकार हरनामदास सहराई भी मुम्बई आए हुए थे। जालन्धर में उनका नल की टोंटियां वग़ैरह बनाने का कारखाना था। वह देश भर में घूम-घूम कर नल की टोंटियां ऑर्डर लिया करते थे और कारख़ाने का कारोबार परिवार के अन्य लोग देखते थे। वह जब भी मिलते अपनी नयी किताब ज़रूर भेंट करते। व्हिस्की की बोतल हमेशा उनके ब्रीफ़केस में रहती। उन्हें कहीं से ख़बर लग गयी थी कि उनका एक हमवतनी ‘धर्मयुग’ में पहुंच गया है। वह अगली बार मुम्बई आए तो मुझसे मिलने दफ़्तर चले आए। फिलहाल उनका इरादा धर्मवीर भारती से मिलने का था।

“भारती को पता चला कि मैं बग़ैर मिले लौट गया तो नाराज़ होगा।” सहराई ने अपनी समस्या बतायी।

“क्या आप धर्मवीर भारती से परिचित हैं ?” मैंने पूछा

“बल्ली, कैसी बच्चों जैसी बात करते हो! वह ‘धर्मयुग’ का सम्पादक है। यह हो ही नहीं सकता कि वह मेरे नाम से परिचित न हो।”

“तुम नहीं जानते सहराई, वह बहुुत घमंडी किस्म का शख़्स है।”
मैंने धीरे से उसके कान में कहा।

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मैं चाहता था कि...

2 weeks ago

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