है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है - बशीर बद्र

bashir badr ghazal hai ajeeb shahar ki zindagi na safar raha
                
                                                             
                            

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है

यूं ही रोज़ मिलने की आरज़ू बड़ी रख-रखाव की गुफ़्तुगू
ये शराफ़तें नहीं बे-ग़रज़ इसे आप से कोई काम है

कहां अब दुआओं की बरकतें वो नसीहतें वो हिदायतें
ये मुतालबों का ख़ुलूस है ये ज़रूरतों का सलाम है

वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है

न उदास हो न मलाल कर किसी बात का न ख़याल कर
कई साल बाद मिले हैं हम तिरे नाम आज की शाम है

कोई नग़्मा धूप के गांव सा कोई नग़्मा शाम की छांव सा
ज़रा इन परिंदों से पूछना ये कलाम किस का कलाम है

5 months ago

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