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Munawwar Lakhnavi: इश्क़ में जान से गुज़रने को, इक हमीं रह गए हैं मरने को

Munawwar lakhnavi ghazal ishq mein jaan se guzarne ko ik hamin reh gaye hain marne ko
                
                                                                                 
                            

इश्क़ में जान से गुज़रने को


इक हमीं रह गए हैं मरने को

मैं तुम्हारी अदाओं के सदक़े
कभी बिगड़ोगे भी सँवरने को

कौन का'बे से भी सिवा है बुलंद
झुक रहा हूँ सलाम करने को

दिल बिखरने पे क्यूँ ये माइल है
रंग किस का है ये निखरने को

है 'मुनव्वर' गुनाह फिर भी सवाब
डर रहे हैं ख़ुदा से डरने को 

1 month ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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