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Urdu Ghazal: निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल 'जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम'

Nida fazli ghazal jab se qareeb ho ke chale zindagi se hum
                
                                                                                 
                            

जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम


ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम

कुछ दूर चल के रास्ते सब एक से लगे
मिलने गए किसी से मिल आए किसी से हम

अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम

शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था
ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम

अच्छी भली थी दुनिया गुज़ारे के वास्ते
उलझे हुए हैं अपनी ही ख़ुद-आगही से हम

जंगल में दूर तक कोई दुश्मन न कोई दोस्त
मानूस हो चले हैं मगर बम्बई से हम 

2 months ago

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