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साक़ी फ़ारुक़ी की ग़ज़ल: अजब हुआ कि गिरह पड़ गई मोहब्बत में

Saqi Faruqi best poetry ajab hua ki girah pad gai mohabbat men
                
                                                                                 
                            बदन चुराते हुए रूह में समाया कर 
                                                                                                

मैं अपनी धूप में सोया हुआ हूँ साया कर 

ये और बात कि दिल में घना अंधेरा है 
मगर ज़बान से तो चाँदनी लुटाया कर 

छुपा हुआ है तिरी आजिज़ी के तरकश में 
अना के तीर इसी ज़हर में बुझाया कर 

कोई सबील कि प्यासे पनाह माँगते हैं 
सफ़र की राह में परछाइयाँ बिछाया कर  आगे पढ़ें

3 weeks ago

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