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Social Media Poetry: मैं हाथ उठाये दुआ के गीतों को गा रहा हूँ

Social Media Poetry:मैं हाथ उठाये दुआ के गीतों को गा रहा हूँ
                
                                                                                 
                            तुम्हें पता है 
                                                                                                

कि बाग़-ए-दुनिया में ख़ार कम हैं और फूल ज़ियादा
बहुत ज़ियादा
इतने ज़ियादा कि दुनिया भर के सभी जनाज़ों पे डाल दोगे तो बच रहेंगे
या इतने ज़ियादा कि यार गुज़रे जहाँ-जहाँ से,क़दम-क़दम पे वहाँ-वहाँ तुम गुलों की चादर बिछा भी दोगे
तो बच रहेंगे
सारी दुनिया के मंदिरों में बुतों के आगे चढ़ा भी दोगे
तो बच रहेंगे
सभी हसीनों के गेसुओं में सजा भी दोगे तो बच रहेंगे
हैं इतने ज़ियादा
तो बात क्या है
जिधर भी देखो दिखाई देते हैं ख़ार ही बस
वो ख़ार जिनकी महीन नोकें ज़हर बुझी हैं
वो ख़ार जो के लहू से मिल कर लहू की हिद्दत को शांत कर दें
बदन के अंदर हज़ार रोगों के बीज बो दें
तमाम ज़ख़्मों की नींव रख दें
दिलों के भीतर जो नफ़रतों को बुलंद कर दें
तुम्हें पता है कि ख़ार अपना जो काम है वो बड़ी ही शिद्दत से कर रहे हैं
ज़हर दिमाग़ों में भर रहे हैं
ये काम मुमकिन हुआ भी यूँ हैं
कि सारे फूलों ने अपनी ख़ुश्बू को अपने खोलों में क़ैद कर के रखा हुआ है
महक जो रूहों को ज़िंदा करती
दिलों के अंदर जो प्यार भरती
किसी क़फ़स में पड़ी हुई है
मैं हाथ उठाये दुआ के गीतों को गा रहा हूँ
कि ख़ुशबुओं की रिहाई होगी इसी तवक़्क़ो में जी रहा हूँ
उमीद करता हूँ आने वाले तमाम मौसम हरे रहेंगे
और बाग़-ए-दुनिया के फूल सारे रंग-ओ-बू से भरे रहेंगे

साभार आशू मिश्रा की फेसबुक वॉल से
1 month ago

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