शाजापुर का 'शाहजहां': पत्नी की याद में घर के बाहर बनवा दिया मंदिर, सुबह-शाम करता है पूजा पाठ

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: प्रशांत कुमार झा Updated Tue, 28 Sep 2021 08:54 AM IST

सार

आज तक आपने लोगों को देवी-देवताओं की पूजा करते देखा होगा, लेकिन क्या कभी आपने मंदिर बनवाकर पत्नी को धूप-आरती दिखाते देखा है। इसका जवाब शायद ना ही होगा। लेकिन उज्जैन में एक पति अपनी पत्नी से बेइंतहा मोहब्बत करता था। पत्नी की मौत के बाद पति ने उसकी याद में घर के बाहर मंदिर बनवा दिया और सुबह-शाम उसमें पूजा पाठ करते हैं।  
 
उज्जैन में शख्स ने पत्नी का मंदिर बनवाया
उज्जैन में शख्स ने पत्नी का मंदिर बनवाया - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

बड़ी पुरानी कहावत है कि प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज है।आपके द्वारा लिए गए फैसले सही होते हैं या गलत यह तो समाज आंकलन करता है, लेकिन आपका प्रेम पवित्र और निश्छल है तो यकीनन आपकी चर्चा चारों ओर होती है और दुनिया आपको जानना चाहती है कि आखिर कौन है वह शख्स जिसका प्रेम मुगल सम्राट शाहजहां की तरह है। 15वीं सदी में जिसने अपनी पत्नी की याद में ताजमहल बनवा दिया था। आज 21वीं सदी में पत्नी की वियोग में पति ने अपने घर के बाहर एक मंदिर ही बनवा डाला। मध्यप्रदेश के शाजापुर में एक शख्स पत्नी की मौत के बाद अंदर ही अंदर टूटने लगा था। पत्नी से वह इतना प्रेम करता था कि उसके बिना शख्स एक पल भी नहीं रह सकता।
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एक दिन पति ने सोचा कि क्यों ने उसकी याद में एक मंदिर बनवा दूं और फिर क्या था पति ने तीन फीट ऊंची प्रतिमा उसकी याद में बनवा डाला। मां के लिए पिता का इस कदर प्यार देख बेटे भी आगे आए। उन्होंने भी मंदिर बनवाने में उनका साथ दिया। अब इस मंदिर में पत्नी की प्रतिमा विराजित कर पति सुबह-शाम पूजा कर रहे हैं।


मामला जिला मुख्यालय से 3 किमी दूर सांपखेड़ा गांव का है। यहां रहने वाले नारायण सिंह बंजारा की पत्नी गीताबाई की कोरोना से इसी साल 27 अप्रैल को मौत हो गई थी। पत्नी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। उनका लगाव राजस्थान के रामदेवरा में स्थित बाबा रामदेव मंदिर से था। वह हर साल वहां दर्शन को जाती थीं।

राजस्थान के कारिगरों ने प्रतिमा बनवाया
नारायण सिंह का भी पत्नी से बेहद लगाव था। गीताबाई की मौत के बाद नारायण सिंह ने उसकी याद में घर के बाहर मंदिर बनाने का निर्णय लिया। गीताबाई की प्रतिमा बनाने का काम राजस्थान के अलवर के मूर्तिकार को 50 हजार रुपये में दिया गया। करीब डेढ़ महीने में प्रतिमा बनकर तैयार हो गई। मूर्ति को राजस्थान से लाकर मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ स्थापित की गई।

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